चिताओं की लपटों के बीच आस्था का अलौकिक उत्सव

चिताओं की लपटों के बीच आस्था का अलौकिक उत्सव

मसाननाथ मंदिर में पूजन के बाद साधु-संन्यासियों ने खेली भस्म होली, डमरू और जयकारों से गूंजा घाट

जीवन और मृत्यु का अद्भुत संगम, जलती चिताओं के बीच गुजरती रहीं शवयात्राएं

कड़ी सुरक्षा में आयोजन, ड्रोन से निगरानी

वाराणसी (रणभेरी)। आस्था की नगरी काशी में शनिवार को एक बार फिर वह दृश्य साकार हुआ, जो दुनिया भर में अपनी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है। मणिकर्णिका घाट पर महाश्मशान की गोद में चिता-भस्म से होली खेली गई। जलती चिताओं की लपटों, गूंजते डमरुओं और हर-हर महादेव के उद्घोष के बीच साधु-संन्यासियों ने भस्म उड़ाकर आध्यात्मिक उत्सव का अद्भुत दृश्य रचा। सुबह से ही घाट और आसपास की गलियों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी थी। देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से आए पर्यटक भी इस अनोखी परंपरा को देखने पहुंचे। आयोजन की शुरुआत बाबा मसान नाथ मंदिर में विधिवत पूजन-अर्चन से हुई। साधु-संन्यासियों ने पहले भस्म, अबीर और गुलाल अर्पित किया, तत्पश्चात पारंपरिक तांडव के साथ भस्म की होली आरंभ हुई। कई संन्यासी शरीर पर चिता-भस्म लपेटे, गले में नरमुंडों की माला धारण किए नृत्य करते दिखाई दिए। कुछ कलाकार शिव बारात और भूत-प्रेत के स्वरूप में सजे थे, जिससे पूरा वातावरण रहस्यमय और रोमांचकारी हो उठा। डमरू की थाप और शंखनाद के बीच उड़ती राख ने घाट क्षेत्र को धूसर रंग में रंग दिया। श्रद्धालु भी भस्म-गुलाल से सराबोर होकर इस अलौकिक क्षण का हिस्सा बने।

चिताओं की लपटों के बीच आस्था का अलौकिक उत्सव

मसाने की होली की विशेषता यही है कि यहां उत्सव और शोक साथ-साथ चलते हैं। एक ओर साधु-संन्यासी तांडव कर रहे थे, दूसरी ओर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया निरंतर जारी रही। शवयात्राएं जयकारों के बीच से गुजरती रहीं। जीवन और मृत्यु का यह सहअस्तित्व काशी की उस दार्शनिक परंपरा को जीवंत करता है, जहां मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार माना जाता है। विदेशी पर्यटक भी इस अद्भुत परंपरा को अपने कैमरों में कैद करते नजर आए। कई श्रद्धालु पहली बार इस दृश्य के साक्षी बने और इसे आध्यात्मिक रोमांच बताया। उनके अनुसार, यह अनुभव किसी भी सामान्य उत्सव से अलग और गहरे आध्यात्मिक भाव से जुड़ा है।भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। घाट की ओर जाने वाले मार्गों पर बैरिकेडिंग की गई थी और कई स्थानों पर रस्सियों के माध्यम से आवाजाही नियंत्रित की जा रही थी। अतुल अंजान त्रिपाठी के नेतृत्व में 12 थानों के इंस्पेक्टर, कई चौकी प्रभारी, पीएसी की चार कंपनियां और आरआरएफ की एक कंपनी तैनात की गई थी। ड्रोन कैमरों से लगातार निगरानी रखी गई, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से तुरंत निपटा जा सके। इस वर्ष प्रशासन ने डीजे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया और आयोजन को सीमित समय में संपन्न कराने का निर्णय लिया। आयोजकों ने स्पष्ट किया कि परंपरा के अनुसार मुख्य अनुष्ठान मंदिर परिसर तक सीमित रहेगा, ताकि घाट क्षेत्र में अनियंत्रित भीड़ न हो।

चिताओं की लपटों के बीच आस्था का अलौकिक उत्सव

आयोजकों के अनुसार, मसाने की होली की तैयारी लगभग छह महीने पहले से शुरू हो जाती है। चिताओं की राख सावधानीपूर्वक एकत्र कर सुरक्षित रखी जाती है। बाबा महाश्मशान समिति का दावा है कि उनकी पीढ़ियां लगभग 350 वर्षों से इस परंपरा को निभाती आ रही हैं। रंगभरी एकादशी के बाद निर्धारित तिथि पर यह आयोजन संपन्न होता है, जिसे देखने हर वर्ष हजारों-लाखों लोग काशी पहुंचते हैं।

चिताओं की लपटों के बीच आस्था का अलौकिक उत्सव

शाम ढलते-ढलते मंदिर परिसर में आरती हुई। भजन-कीर्तन और डमरू की थाप के बीच श्रद्धालु झूमते रहे। उड़ती भस्म और गूंजते जयकारों ने यह संदेश दिया कि काशी में मृत्यु भी उत्सव का ही एक रूप है। मसाने की यह होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के शाश्वत दर्शन का प्रतीक है, जहां राख में भी आस्था का रंग है और महाश्मशान में भी उत्सव की उजास।

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