(रणभेरी): सोशल मीडिया की तेज रफ्तार दुनिया में इन दिनों एक वीडियो ने नई बहस को जन्म दे दिया है। वायरल हो रहे इस वीडियो में कुछ स्कूली छात्राएं मंच पर फिल्मी गाने पर टॉवल लपेटकर डांस करती दिखाई दे रही हैं। दावा किया जा रहा है कि यह दृश्य कोलकाता के एक निजी CBSE स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम का है। हालांकि वीडियो की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है, लेकिन इसने इंटरनेट पर तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू कर दिया है।
मंच पर प्रस्तुति या मर्यादा का सवाल?
वीडियो में छात्राओं द्वारा जिस अंदाज में प्रस्तुति दी गई है, उसने समाज के एक बड़े वर्ग को असहज कर दिया है। कुछ लोग इसे आधुनिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति मानते हुए सामान्य बता रहे हैं, वहीं कई यूजर्स इसे स्कूल जैसे शैक्षणिक मंच के लिए अनुचित करार दे रहे हैं।
क्लासिक गाने की नई प्रस्तुति पर विवाद
बताया जा रहा है कि यह प्रस्तुति मशहूर फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ के लोकप्रिय गीत ‘मेरे ख्वाबों में’ पर आधारित थी। 90 के दशक की इस फिल्म को पारिवारिक मनोरंजन के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन वायरल वीडियो में उसी गाने को जिस तरह से मंचित किया गया, उस पर लोगों ने आपत्ति जताई है।
सोशल मीडिया पर बंटी राय
वीडियो के सामने आने के बाद कमेंट्स की बाढ़ आ गई है। कुछ यूजर्स का कहना है कि “स्कूल के कार्यक्रमों में इस तरह की प्रस्तुति बच्चों के लिए उचित नहीं है।” वहीं अन्य लोग इसे “क्रिएटिव एक्सप्रेशन” बताते हुए अनावश्यक विवाद मान रहे हैं। एक यूजर ने टिप्पणी करते हुए लिखा कि जिस फिल्म को परिवार के साथ देखने योग्य माना गया था, उसी के गाने को इस तरह प्रस्तुत करना सवाल खड़े करता है।
शिकायत के बाद जांच की मांग
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब एक सामाजिक संगठन ‘सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन’ ने इस पर औपचारिक शिकायत दर्ज कर दी। संगठन ने मांग की है कि स्कूलों में आयोजित कार्यक्रमों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएं, ताकि किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक प्रस्तुति को रोका जा सके।
शिक्षा संस्थानों के लिए एडवाइजरी की मांग
शिकायत में यह भी सुझाव दिया गया है कि शिक्षा विभाग की ओर से एक व्यापक एडवाइजरी जारी की जाए, जिससे भविष्य में इस तरह के विवादों से बचा जा सके और स्कूलों की गरिमा बनी रहे।
फिलहाल बहस जारी
वीडियो की सत्यता और संदर्भ की जांच अभी बाकी है, लेकिन यह मुद्दा समाज में बदलती सांस्कृतिक सोच और शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी पर एक नई बहस जरूर छेड़ गया है।
