- बीएचयू – ट्रॉमा मार्ग : जहां कानून नहीं, वसूली का राज
अजीत सिंह
वाराणसी (रणभेरी)। पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल के सख्त आदेश कागज़ों में चमकते हैं, लेकिन ज़मीन पर उनकी इज्ज़त रोज़ रौंदी जा रही है। बीएचयू तिराहा से लंका होते हुए ट्रॉमा सेंटर तक का मार्ग, जिसे आपात सेवाओं के लिए निर्बाध रखने का स्पष्ट निर्देश है। आज अवैध स्टैंड माफिया और कथित पुलिस संरक्षण का खुला अखाड़ा बन चुका है। यहां कानून नहीं चलता, यहां पैसा चलता है।
जिस सड़क से हर मिनट एंबुलेंसें और गंभीर मरीज गुजरते हैं, उसी पर ऑटो, ई-रिक्शा और बाइकें बेशर्मी से कतारबद्ध खड़ी मिलेंगी। “100 मीटर के भीतर पार्किंग निषिद्ध” का बोर्ड महज़ दीवार की सजावट बन चुका है। ठीक उसके नीचे अवैध स्टैंड फल-फूल रहा है। एंबुलेंसें रुकती हैं, मरीज तड़पते हैं और इलाज तक पहुंचने में कीमती मिनट नष्ट हो जाते हैं। नगर निगम और ट्रैफिक पुलिस ने पार्किंग के लिए जगह तय कर रखी है, फिर भी सड़क की आधी चौड़ाई गाड़ियों ने निगल ली है। पैदल चलना दूभर है, दुकानदारों के ग्राहक छूट रहे हैं, तीमारदारों को दूर तक मरीज ढोने पड़ रहे हैं। सवाल सीधा है ! आखिर यह अराजकता किसके भरोसे जिंदा है?

नगवां चौकी के पास: कानून नहीं, ‘वसूली काउंटर’
सबसे चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि पूरा अवैध ऑटो स्टैंड नगवां पुलिस चौकी से महज़ सौ मीटर पर बेखौफ चलता है। जिस चौकी का काम अपराध रोकना है, उसी की नाक के नीचे रोज़ का ‘कलेक्शन’ जारी है। स्थानीय चालकों का आरोप है कि बिना “सेटिंग” कोई वाहन खड़ा नहीं हो सकता, हर रोज़ हर वाहन से पैसा लिया जाता है। यह कोई छिपा खेल नहीं; सड़क पर दिखता हुआ सच है। जाम लगता है, एंबुलेंस फंसती हैं, लेकिन कार्रवाई शून्य।
कभी-कभार दो-चार ऑटो हटाकर औपचारिकता निभा दी जाती है, कैमरे हटते ही वही स्टैंड पहले से ज्यादा मजबूती से लौट आता है। यह कानून नहीं, नाटक है ! और इस नाटक की पटकथा बिना पुलिस की मिलीभगत या मौन सहमति के लिखी ही नहीं जा सकती। अगर चौकी से सौ मीटर दूर खुली वसूली पर किसी को डर नहीं, तो कानून आखिर किसके लिए है?

आदेशों की खुलेआम अवहेलना
सीपी के निर्देश साफ हैं…नो-पार्किंग ज़ोन और अवैध स्टैंड पर निरंतर सख्ती। मगर लंका-नगवां में इन आदेशों का हश्र मज़ाक से बेहतर नहीं। यहां मनमानी का राज है। चालान काटने और दो-चार वाहन हटाने की रस्में बस यह दिखाने के लिए हैं कि “कार्रवाई हो रही है।” हकीकत यह है कि अवैध धंधा बेरोक-टोक चलता है। नागरिकों और चालकों का आरोप है कि यह सब ऊपर तक “सब ठीक है” का भ्रम बनाए रखने की रणनीति है। अगर पुलिस सच में ईमानदार होती, तो चौकी के पास खुले वसूली बाजार का नामोनिशान नहीं बचता।
चौकी प्रभारी की चुप्पी: लापरवाही या संरक्षण?
नगवां चौकी प्रभारी अभिषेक सिंह की भूमिका पर गंभीर प्रश्न हैं। जिनके इलाके में यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है, वही अधिकारी रहस्यमयी खामोशी ओढ़े हैं। यह महज़ लापरवाही है या किसी गहरे संरक्षण का संकेत? जब एंबुलेंस जाम में फंसती है, जब घायल समय पर ट्रॉमा सेंटर नहीं पहुंच पाता तब जवाबदेह कौन होगा?
जनता की जान दांव पर
बीएचयू-लंका-ट्रॉमा मार्ग वाराणसी की स्वास्थ्य व्यवस्था की नब्ज़ है। अगर यही नब्ज़ अवैध स्टैंड और वसूली तंत्र के शिकंजे में रहेगी, तो कीमत किसी दिन किसी मरीज की जान से चुकानी पड़ेगी। अब प्रश्न ट्रैफिक का नहीं, कानून की साख और जनता की ज़िंदगी का है। देखना यह है कि पुलिस कमिश्नर इस खुले खेल पर कब और कैसे लगाम लगाते हैं या फिर यह रास्ता यूं ही ‘पुलिस के साये में पलते अवैध साम्राज्य’ की पहचान बना रहेगा।
