समुद्री जैव विविधता और एंजाइम रिसर्च से दवा, पर्यावरण व उद्योग में खुलेंगी नई संभावनाएं
राधेश्याम कमल
भुवनेश्वर/वाराणसी (रणभेरी): इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज में वैज्ञानिक गहरे समुद्र की अनछुई संपदा और कैंसर उपचार जैसे अहम क्षेत्रों में अत्याधुनिक शोध कर रहे हैं। यहां समुद्री जैव विविधता, सूक्ष्म जीवों और विशेष एंजाइमों पर हो रहे अध्ययन से भविष्य में नई दवाओं और औद्योगिक उपयोग की संभावनाएं तेजी से उभर रही हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी का गहरा समुद्री क्षेत्र अब भी सबसे कम खोजे गए हिस्सों में शामिल है।
इन क्षेत्रों में मौजूद सूक्ष्म जीवों और जैविक संसाधनों की पहचान कर उनके डीएनए का विश्लेषण किया जा रहा है, जिससे नई वैज्ञानिक जानकारियां सामने आ रही हैं। यह शोध न केवल विज्ञान के दायरे को बढ़ा रहा है, बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में भी नई उम्मीदें जगा रहा है।
भारत सरकार के डीप ओसियन मिशन के तहत भी संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस मिशन के माध्यम से गहरे समुद्र में छिपी जैविक और खनिज संपदा की खोज के साथ-साथ उनके वैज्ञानिक उपयोग पर काम किया जा रहा है। समुद्री जीवों से प्राप्त विशेष एंजाइमों का अध्ययन किया जा रहा है, जो कठिन परिस्थितियों में भी सक्रिय रहते हैं और जिनका उपयोग पर्यावरण संरक्षण, जैव प्रौद्योगिकी तथा औषधि निर्माण में किया जा सकता है।

संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. गुलाम के अनुसार समुद्री सूक्ष्म जीवों से मिलने वाले एंजाइम कई औद्योगिक प्रक्रियाओं को सरल और प्रभावी बना सकते हैं। साथ ही, इनका उपयोग प्रदूषण नियंत्रण और टिकाऊ विकास के लिए भी किया जा सकता है।
कैंसर शोध के क्षेत्र में भी संस्थान तेजी से आगे बढ़ रहा है। आधुनिक तकनीकों और डीएनए विश्लेषण के जरिए कैंसर की प्रारंभिक पहचान और बेहतर उपचार के लिए नई संभावनाएं तलाश की जा रही हैं। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से बड़े पैमाने पर जैविक डेटा का विश्लेषण आसान हुआ है, जिससे शोध कार्यों में गति आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के विशाल समुद्री क्षेत्र को देखते हुए समुद्री जैव संसाधनों की खोज देश के वैज्ञानिक और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। संस्थान का साइंस फॉर सोसाइटी दृष्टिकोण इन शोधों को सीधे समाज के लाभ से जोड़ने का प्रयास कर रहा है।
