वाराणसी (रणभेरी): काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) ने पर्यावरण संरक्षण और कचरा प्रबंधन की दिशा में एक उल्लेखनीय पहल की है, जिसके तहत परिसर में जमा होने वाले सूखे पत्तों को अब उपयोगी जैविक खाद में बदला जा रहा है। जो पत्ते पहले तक गंदगी और आग के खतरे का कारण बनते थे, वे अब किसानों और बागवानी करने वालों के लिए मूल्यवान संसाधन बन गए हैं।
गर्मी के मौसम में सूखे पत्तों का बड़ी मात्रा में इकट्ठा होना एक आम समस्या रहती है। हल्की सी चिंगारी या लापरवाही से इनके कारण आग लगने का जोखिम भी बढ़ जाता है। पहले इन्हें एकत्र कर निस्तारण के लिए नगर निकायों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिसमें अतिरिक्त समय और संसाधनों की खपत होती थी।
लेकिन BHU के उद्यान विभाग ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए एक स्थायी समाधान विकसित किया है। विभाग इन सूखे पत्तों को वैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से कंपोस्ट यानी जैविक खाद में परिवर्तित कर रहा है। यह खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और पौधों की बेहतर वृद्धि में सहायक साबित हो रही है।

इस उत्पाद की बढ़ती उपयोगिता के कारण इसे “काला सोना” के नाम से भी जाना जाने लगा है। विश्वविद्यालय परिसर में इसका उपयोग तो हो ही रहा है, साथ ही इसे आम लोगों के लिए भी उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि शहरी बागवानी और घरेलू पौधों की देखभाल में इसका लाभ लिया जा सके।
वहीं किसानों के लिए भी यह जैविक खाद काफी उपयोगी साबित हो रही है। इसके इस्तेमाल से फसलों, विशेषकर सब्जियों और फलों की पैदावार में सुधार देखा जा रहा है, साथ ही रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम हो रही है।
उद्यान विभाग के वरिष्ठ अधिकारी प्रोफेसर अश्विनी कुमार देशवाल के अनुसार, विश्वविद्यालय परिसर में हर वर्ष बड़ी मात्रा में सूखे पत्ते इकट्ठा होते हैं, जो पहले एक समस्या थे। अब वही पत्ते पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण संसाधन बन चुके हैं। यह पहल न केवल कचरा प्रबंधन का बेहतर उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सही दृष्टिकोण अपनाकर बेकार समझी जाने वाली चीजें भी आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ का स्रोत बन सकती हैं।
