संतान की लंबी उम्र के लिए माताएं कल रखेंगी जीवित्पुत्रिका व्रत

संतान की लंबी उम्र के लिए माताएं कल रखेंगी जीवित्पुत्रिका व्रत

वाराणसी (रणभेरी):  संतान की लंबी उम्र के लिए महिलाएं जीवितपुत्रिका व्रत रखती हैं। पंचांग के अनुसार यह व्रत हर वर्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस वर्ष 29 सितंबर को रखा जाएगा। इस दिन महिलाएं संतान की दीघार्यु, आरोग्यता, सुखमय जीवन के लिए निर्जला व्रत रखकर भगवान की पूजा और प्रार्थना करती है। जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण अगले दिन यानी नवमी तिथि को किया जाता है। यह व्रत देश के अधिकतर हिस्सों में मनता है लेकिन प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में इसे बहुत ही विधि-विधान से मनाया जाता है। 

व्रत की पूजन विधि 

व्रत के दिन महिलाएं नित्यकर्म, स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पूजा स्थल पर सूर्य देव की प्रतिमा को स्नान कराकर स्थापित करें। अब उनके समक्ष धूप, दीप आदि से आरती करें। इसके बाद उन्हें मिष्ठानों का भोग लगाएं। इस व्रत में माताएं सप्तमी तिथि को खाना और जल ग्रहण कर व्रत की शुरूआत करती हैं और अष्टमी तिथि को पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं। व्रत के अगले दिन यानी नवमी तिथि को व्रत का पारण कर उसका समापन किया जाता है। व्रती माताएं जो 29 सितंबर को जीवित्पुत्रिका व्रत रहेंगी, उनको 30 सितंबर दिन गुरुवार को प्रात: स्नान आदि के बाद पूजा करके पारण करना होगा। दोपहर से पूर्व पारण कर लेना उत्तम होगा।

जिवितपुत्रिका व्रत का महत्व

जिवितपुत्रिका यानी जीवित संतान के लिए रखा जाने वाला व्रत। यह व्रत सभी सौभाग्यवती स्त्रियां रखती हैं, जिनको पुत्र होते हैं और साथ ही जिनके संतान नहीं होती वह भी संतान कामना और बेटी की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं। माताएं अपने बच्चों की अच्छी सेहत की कामना से दिन और रातभर निर्जला यानी बिना पानी पिए ये उपवास करती हैं। इस व्रत को करने से संतान को लंबी उम्र के साथ अच्छा स्वास्थ्य और संपन्नता प्राप्त होती है।

व्रत कथा

महाभारत युद्ध के बाद पाण्डवों की गैर मौजूदगी में कृतवर्मा और कृपाचार्य को साथ लेकर अश्वत्थामा पाण्डवों के शिविर में गए। अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पुत्रों को पाण्डव समझकर उनके सिर काट दिए। दूसरे दिन अर्जुन कृष्ण भगवान को साथ लेकर अश्वथामा की खोज में गए और उन्हें बन्दी बना लिया, लेकिन फिर धर्मराज युधिष्ठर और श्रीकृष्ण के परामर्श पर अश्वत्थामा के सिर की मणि लेकर तथा केश मूंड़कर उसे बन्धन से मुक्त कर दिया गया। अश्वत्थामा ने अपमान का बदला लेने के लिये अमोघ अस्त्र का प्रयोग पाण्डवों के वशंधर उत्तरा के गर्भ पर किया।

इसके बाद पाण्डवों ने श्रीकृष्ण से उत्तरा के गर्भ की रक्षा की प्रार्थना की। फिर भगवान श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप से उत्तरा के गर्भ में प्रवेश करके उसकी रक्षा की। किन्तु उत्तरा के गर्भ से मृत बालक उत्पन्न हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे प्राण दान दिया। वही पुत्र पाण्डव वंश का भावी कणार्धार परीक्षित हुआ। परीक्षित को इस प्रकार जीवनदान मिलने के कारण इस व्रत का नाम "जीवित्पुत्रिका" पड़ा।