‘बख्शीस’ का खेल और कानून पर पट्टी, गरीबों पर डंडा, शराबियों पर रहम क्यों ?
संदेह के घेरे में नगवां चौकी : वसूली के आरोप, ड्यूटी से दूरी और कानून की कमजोर पड़ती पकड़
अजीत सिंह
वाराणसी (रणभेरी)। जिस काशी को देश-दुनिया अध्यात्म, संस्कृति और शालीनता के लिए जानता है, उसी काशी की सड़कों पर आज बेखौफ शराबी कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं और यह सब हो रहा है वाराणसी में लंका थाना की पुलिस की आंखों के सामने। वाराणसी, जो कि नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है, वहां लंका-अस्सी रोड अब यातायात मार्ग नहीं बल्कि नशेड़ियों का स्थायी अड्डा बन चुकी है। सवाल सीधा है ! अगर प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में यह हाल है, तो बाकी प्रदेश की तस्वीर क्या होगी?
लंका-अस्सी रोड, जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और अस्सी घाट को जोड़ती है, भोर से देर रात तक शराब की दुर्गंध और गालियों से गूंजती रहती है। सड़क किनारे बैठकर जाम छलकाते शराबी, ट्रैफिक के बीच लड़खड़ाते कदम, राहगीरों से उलझना, यह सब अब ‘नियम’ बन चुका है। हैरत यह है कि नगवां चौकी क्षेत्र में पुलिस की न तो नियमित गश्त दिखती है और न ही कोई सख्त कार्रवाई। नतीजा…अपराधियों के हौसले सातवें आसमान पर।

महिलाओं की गरिमा पर हमला, पुलिस की चुप्पी सबसे बड़ा अपराध
इस मार्ग से गुजरने वाली छात्राएं, कामकाजी महिलाएं और स्थानीय महिलाएं रोज़ अपमान और डर के साये में चलने को मजबूर हैं। नशे में धुत लोग सीटी बजाते हैं, अश्लील टिप्पणियां करते हैं और फब्तियां कसते हैं। कई महिलाएं रास्ता बदलने लगी हैं, कुछ ने समय बदल लिया है, यह किसी शहर की नहीं, योगी राज के पुलिस की विफलता की कहानी है। पर्यटक जब अस्सी घाट की गंगा आरती के लिए निकलते हैं, तो काशी की यह बदहाल तस्वीर देखकर शहर की छवि तार-तार हो जाती है। क्या महिला सुरक्षा सिर्फ कागज़ों तक सीमित है?

संदेह के घेरे में नगवां चौकी : वसूली के आरोप, ड्यूटी से दूरी और कानून की कमजोर पड़ती पकड़
लंका थाना क्षेत्र की नगवां पुलिस चौकी बड़े गंभीर सवालों के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार चौकी पर तैनात प्रभारी सहित कुछ पुलिसकर्मियों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है, जिनकी निगरानी में क्षेत्र में असामाजिक तत्वों के हौसले बढ़े और गैरकानूनी गतिविधियां निर्बाध चलती रहीं। आरोप है कि ड्यूटी के प्रति सख्ती दिखाने के बजाय कथित तौर पर ‘वसूली’ के प्रति उदासीनता नहीं, बल्कि अतिरिक्त सक्रियता दिखाई गई।
यह पूरा मामला वाराणसी, जो नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है में कानून-व्यवस्था की जवाबदेही पर सीधा प्रश्न खड़ा करता है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल पुलिस आचरण के मानकों का उल्लंघन होगा, बल्कि योगी आदित्यनाथ सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की जमीनी परीक्षा भी है। कानूनी दृष्टि से यह आवश्यक है कि तथ्यों की निष्पक्ष जांच हो, सीसीटीवी,गश्त रजिस्टर,ड्यूटी चार्ट की समीक्षा की जाए और आरोपों की पुष्टि या खंडन पारदर्शी प्रक्रिया से किया जाए। जनता का भरोसा तभी बचेगा, जब संदेह के घेरे में आई भूमिका पर त्वरित, निष्पक्ष और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित होगी।
‘बख्शीस’ का खेल और कानून पर पट्टी
इलाके में चर्चा आम है कि शराब ठेकों से मिलने वाली ‘मंथली बख्शीस’ ने पुलिस की आंखों पर पट्टी बांध दी है। खुलेआम सड़क पर शराब पीना अपराध है, फिर भी कोई डर नहीं। कभी-कभार दिखावटी कार्रवाई होती है ताकि फाइलें भरी रहें लेकिन जमीन पर शराबियों को खुली छूट है। सवाल यह है कि अगर संरक्षण नहीं, तो यह निर्भीकता कहां से?
गरीबों पर डंडा, शराबियों पर रहम क्यों ?
विडंबना देखिए ! अतिक्रमण के नाम पर ठेला-खुमचा वालों पर सबसे पहले कार्रवाई, सामान जब्त, चालान और खदेड़ना। लेकिन वही पुलिस शराबियों के हंगामे पर मौन। कानून दो तरह से लागू क्यों? क्या कानून सिर्फ कमजोरों के लिए है?
जीरो टॉलरेंस की उड़ती धज्जियां
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करती है, मगर जमीनी हकीकत लंका-अस्सी रोड पर चीख-चीखकर उलटा बयान दे रही है। जब पुलिस ही अपराध की जड़ में खड़ी दिखे, तो जनता किससे उम्मीद करे?
चेतावनी साफ है
यदि तत्काल सख्त कार्रवाई, ठेकों की जवाबदेही और पुलिस की निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं हुई, तो यह इलाका अराजकता का स्थायी केंद्र बन जाएगा। काशी की गरिमा, महिलाओं की सुरक्षा और कानून का सम्मान ! तीनों दांव पर हैं। अब सवाल पूछना ही पड़ेगा कि पुलिस किसके साथ है ? जनता के या शराबियों के ?
