शिक्षा या कारोबार, निजी स्कूलों की मनमानी पर कब लगेगी लगाम !

शिक्षा या कारोबार, निजी स्कूलों की मनमानी पर कब लगेगी लगाम !
  • महंगाई की चक्की में पिसते अभिभावक, तय दुकानों से ही खरीदने का दबाव, अभिभावकों की जेब पर सीधा वार
  • एनसीईआरटी की अनदेखी, महंगी निजी प्रकाशकों की किताबों का खेल
  • ड्रेस से लेकर कॉपी-किताब तक ‘पैकेज सिस्टम’, बच्चों को शिक्षित बनने के लिए मजबूर अभिभावक

वाराणसी (रणभेरी)। शिक्षा, जिसे समाज का आधार माना जाता है, आज अभिभावकों के लिए सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बनती जा रही है। नया सत्र शुरू होते ही निजी स्कूलों की फीस, किताबें, ड्रेस और अन्य खर्चों ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। हालात ऐसे हैं कि मध्यम वर्गीय परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर गंभीर आर्थिक दबाव झेलने को मजबूर हैं।

शहर के अधिकांश निजी स्कूलों में एक सुनियोजित व्यवस्था के तहत अभिभावकों को केवल निर्धारित दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए बाध्य किया जा रहा है। इन दुकानों पर न तो कोई छूट मिलती है और न ही कीमतों में पारदर्शिता होती है। कई अभिभावकों का आरोप है कि बाजार में उपलब्ध सस्ती किताबों और ड्रेस के बावजूद उन्हें महंगे ‘पैकेज’ खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर निजी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें क्यों लागू नहीं की जा रही हैं? जबकि सरकार लगातार शिक्षा को सस्ता और सुलभ बनाने की बात करती है, वहीं निजी स्कूल महंगे निजी प्रकाशकों की किताबें थोपकर अभिभावकों का आर्थिक शोषण कर रहे हैं। एक कक्षा के छात्र की किताबों का खर्च कई बार 5 से 10 हजार रुपये तक पहुंच जाता है, जो आम परिवार के लिए भारी बोझ है।

यही नहीं, यूनिफॉर्म के नाम पर भी खुली लूट जारी है। स्कूल प्रबंधन द्वारा तय की गई दुकानों से ही ड्रेस खरीदनी पड़ती है, जहां एक जोड़ी यूनिफॉर्म की कीमत सामान्य बाजार से दोगुनी तक होती है। जूते, मोजे, बैग और अन्य आवश्यक सामग्री भी उसी ‘पैकेज’ में शामिल कर दी जाती है, जिससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता। अभिभावकों का कहना है कि यह पूरा सिस्टम कमीशनखोरी पर आधारित है, जिसमें स्कूल प्रबंधन और दुकानदारों के बीच सांठगांठ होती है। हर साल सिलेबस में मामूली बदलाव कर किताबों को बदल दिया जाता है, ताकि पुरानी किताबें किसी काम की न रहें और हर बार नई खरीदारी करनी पड़े।

सरकार और शिक्षा विभाग की ओर से समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं कि स्कूल किसी विशेष दुकान से खरीदारी के लिए बाध्य नहीं कर सकते, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। प्रशासनिक स्तर पर निगरानी और सख्त कार्रवाई के अभाव में निजी स्कूलों की मनमानी लगातार बढ़ती जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें अनिवार्य कर दी जाएं और यूनिफॉर्म को ओपन मार्केट में उपलब्ध कराया जाए, तो अभिभावकों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ काफी हद तक कम हो सकता है। इसके लिए सरकार को सख्त नीति बनाकर उसका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।

फिलहाल, सवाल जस का तस बना हुआ है, आखिर कब तक अभिभावक महंगाई की इस चक्की में पिसते रहेंगे? क्या शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा, या फिर हर साल इसी तरह अभिभावकों की जेब पर ‘शिक्षा का बोझ’ बढ़ता रहेगा?

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