वाराणसी: सुप्रीम कोर्ट की हो रही अनदेखी, अस्सी के 'आरती युद्ध' से फट रहे बनारसियों के कान

वाराणसी: सुप्रीम कोर्ट की हो रही अनदेखी, अस्सी के 'आरती युद्ध' से फट रहे बनारसियों के कान

ध्वनि प्रदुषण का केन्द्र बना अस्सी घाट, महज डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर दो जगह आरती, एक घाट संध्या
तीन घंटे बजते हैं 6-8 बड़े लाउडस्पीकर और माइक, 75 के बजाय 115 डेसीबल ध्वनि मचाती है हलचल

वाराणसी(रणभेरी): कभी आस्था, साधना, शांति और ध्यान का सबसे बड़ा केन्द्र रह चुका अस्सी घाट आज ध्वनि प्रदुषण का सबसे बड़ा केन्द्र बन चुका है। कथित आस्था लोगों को बहरा बनाने का काम कर रही है। अस्सी घाट पर इस समय मात्र डेढ सौ मीटर की दूरी पर दो जगह आरती और एक जगह घाट संध्या हो होती है। मात्र इतनी ही दूरी पर 6-8 कानफाड़ू और बडे लाउडस्पीकर बजते हैं। जिसकी वजह से ध्वनि के मानक 75 डेसीबल के बजाय उस समय अस्सी घाट पर 115 डेसीबल को भी ध्वनि पार कर जाती है।

यह तो आम दिनों की बात है वैसे किसी न किसी दिन हमेशा अस्सी घाट पर गीत-संगीत समेत तमाम तरह के बड़े आयोजन होते रहते हैं। उन दिनों तो ध्वनि प्रदुषण अपने चरम पर होता है, जो सेहत के लिए खासकर कानों के लिए बेहद खतरनाक है। विडम्बना यह कि अस्सी पर यह आरती युद्ध आज से नहीं बल्कि 1-2 सालों से रोजाना हो रहा है पर न तो इसपर किसी का ध्यान है और न ही कोई इन्हें रोक-टोक करने वाला है।

ये समितियां कराती हैं आरती: 

अस्सी घाट पर जाह्नवी सेवा समिति के द्वारा आरती में तीन बड़े लाउडस्पीकर, जय मां गंगा सेवा समिति द्वारा दो बड़े सात सौ वॉट के लाउडस्पीकर और घाट संध्या में दो लाउडस्पीकर प्रयोग होते हैं। हालांकि सुबह-ए-बनारस के घाट संध्या में ध्वनि का डेसीबल अपेक्षाकृत काफी कम होता है। हमारे रिपोर्टर ने ध्वनि मापक से आरती के समय इन जगहों की ध्वनि का मापा जिसका स्क्रीन शॉट भी आपके सामने है।

एक जगह पर इतनी आरती कहीं व्यापार तो नहीं?

हम आस्था और पूजा के बिल्कुल विरोधी नहीं है पर यह कैसी पूजा जो लोगों को बहरा बना दे। वहीं अगर देखा जाए तो एक ही जगह पर दो आरती करने का क्या तुक है। अगर आप मां गंगा की आरती करना ही चाहते हैं तो अन्य सूने पड़े घाटों पर भी कर सकते हैं अस्सी पर ही सभी संस्थाओं द्वारा आरती कराना आस्था नहीं बल्कि ज्यादा व्यापार का स्वार्थ समझ आता है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी मानक?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी गाइड लाइन के अनुसार  40 से लेकर 75 डेसीबल तक का वॉल्यूम ही होना चाहिए। इससे अधिक वॉल्यूम में लाउडस्पीकर बजाने पर कार्रवाई भी की जाना तय की गई है। इसके लिए सबसे कम ध्वनि साइलेंस जोन की 40 डेसीबल और सबसे अधिक ध्वनि औद्योगिक क्षेत्र की 75 डेसीबल तय है। 

कान और हार्ट को भी खतरा:

डॉक्टरों के अनुसार ज्यादा से ज्यादा 80 डेसीबल तक आवाज को मनुष्य सहन सकता है । इससे ज्यादा आवाज होने पर कानों की नसों पर जोर पड़ता है। जो तनाव बढ़ाता है। कान का पर्दा फटने की भी आशंका रहती है। ध्वनि प्रदूषण हार्ट के लिए खतरनाक है।

किस क्षेत्र में कितनी तेज बज सकता है लाउडस्पीकर:

औद्योगिक क्षेत्र- 75- 70 डेसीबल
व्यवसायिक क्षेत्र-65- 55 डेसीबल
आवासीय क्षेत्र- 55- 45 डेसीबल                                                                                                        शांत क्षेत्र -50- 40 डेसीबल

आप कर सकते हैं शिकायत:

2005 में सुप्रीम कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण से जुड़े एक केस की सुनवाई करते हुए कहा था कि जीने के अधिकार में ये भी शामिल है कि आप किसी शोर को सुनना चाहते हैं या नहीं और कोई भी शख्स शोर मचाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 19(1) अ में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ नहीं ले सकता। इसलिए आप इस शोर के खिलाफ कलेक्टर को शिकायत कर सकते हैं।

धर्म के नाम पर आस्था के साथ खिलवाड़:
इस समय बस धर्म के नाम पर आस्था के साथ खिलवाड़ हो रहा है। एक समय था जब लोग भागदौड़ भरी जिंदगी से ऊबकर घाट पर प्राकृतिक सौन्दर्य और शांति के लिए आते थे पर आज ये सब गायब ही हो गया है। गंगा आरती के नाम पर शोर-शराबा किया जा रहा है। बनारस के सभी मुख्य घाट आस्था नहीं व्यापार का केन्द्र बन चुके हैं। अस्सी घाट पर ही देख लीजिए एक ही समय पर महज चंद कदमो की दूरी पर तीन कार्यक्रम होते हैं, सभी के लाउड स्पीकर इतने तेज होते हैं कि आवाज आपस मे लड़ती है। गंगा आरती या अन्य पूजा पाठ में शांति मिलती है पर यहां तो कान ही सुन्न हो जाता है।
                                                                                                                      वैशाली गोठी

 

दोषियों पर होनी चाहिए कार्रवाई:
अस्सी घाट पर ध्वनि प्रदुषण की शिकायत मुझसे भी कई लोगों ने की थी। मैं इस संदर्भ में जल्द ही जिलाधिकारी को ज्ञापन दूंगा। वैसे मानक के अनुसार लाउडस्पीकर के एक मीटर की दूरी तक अगर 75 डेसीबल से ज्यादा ध्वनि है तो उनपर दिन में भी कार्रवाई किए जाने का नियम है। जहां आरती हो रही है अगर वहां ऐसा है तो निश्चित ही दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
                                                                                                         चेतन उपाध्याय, सचिव, सत्या फाउंडेशन

साभार: अमरेन्द्र पाण्डेय