वाराणसी: अयोध्या में राम मंदिर से पहले बनेगा चंदन की लकड़ी का 'बाल राममंदिर'

वाराणसी: अयोध्या में राम मंदिर से पहले बनेगा चंदन की लकड़ी का 'बाल राममंदिर'

शंकराचार्य स्वारूपानंद ने शुरू कर दिया है बालराममंदिर का निर्माण कार्य
हटेगा रामलला के ऊपर लगा 'मजबूरी का तिरपाल', देश भर में गांव-गांव जाकर सोना जुटाएंगे संतजन

वाराणसी(रणभेरी): कोटि सनातनी रामभक्तों की आस्था के केन्द्र श्रीरामजन्मभूमि अयोध्या में विराजमान रामलला को भव्य-दिव्य-विशाल मन्दिर में स्थापित करना सबका मनोरथ है पर उससे भी पहले ‘मजबूरी के तिरपाल’ को हटाकर रामलला की महिमा के अनुरूप मन्दिर में विराजमान कर देना जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती सहित शीर्ष धमार्चार्यों की प्राथमिकता में है।

रामभक्तों की इसी भावना के अनुरूप उन्होंने एक अस्थायी मन्दिर जिसे शास्त्रों में बालमन्दिर कहा जाता है का निर्माण आरम्भ कर दिया है। यह जानकारी न्यायालय में प्रमुख पक्षकार रही संस्था श्रीरामजन्मभूमि पुनरुद्धार समिति के उपाध्यक्ष और अयोध्या श्रीरामजन्मभूमि रामालय न्यास के सचिव स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने काशी के केदारघाट स्थित श्रीविद्यामठ में सोमवार को आयोजित प्रेसवार्ता में दी।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि रामलला के भव्य दिव्य मन्दिर के लिये किसी उचित ट्रस्ट को भूमि सौंपने, ले आउट तैयार करने और फिर निर्माण आरम्भ करने में तो समय लगेगा ही पर निर्माण आरम्भ भी हो जाये तो उसे पूरा होने में पांच से दस वर्ष लगने की संभावना विशेषज्ञ बता रहे हैं। ऐसे में यह बड़ा प्रश्न है कि क्या रामलला तब तक तिरपाल में ही रहेंगे?

ढांचा गिरने के बाद से उच्चतम न्यायालय के निर्णय के आने के बाद तक तो न्यायालय के यथास्थिति के आदेश के कारण तिरपाल को हटाना संभव नहीं था। उसे बनाये रखना हमारी ‘मजबूरी’ थी। पर अब तो रामलला की विजय हुई है। कोई यथास्थिति का आदेश भी नहीं है। ऐसे में भी रामलला तिरपाल में रहें यह हृदय को कचोटने वाली बात है। इसलिये भी मजबूरी के तिरपाल को जितनी जल्दी हटा दिया जाये उतना ही अच्छा है।

न्यायालय ने केन्द्र को नया ट्रस्ट बनाने को नहीं कहा:
स्वामी ने आगे कहा कि शंकराचार्य का मानना है कि उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र सरकार को नियमावली बनाकर उचित ट्रस्ट को जमीन सौंपने के लिए तीन माह का समय दिया है न कि नया ट्रस्ट बनाने को। न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि 1993 के अधिग्रहण की शर्तों को पूरा करने वाले ट्रस्ट को यह भूमि दी जा सकेगी। इसी सन्दर्भ में चारों शंकराचार्यों, पांचों वैष्णवाचार्यों और तेरहों अखाड़ों के रामालय न्यास ने केन्द्र सरकार के समक्ष मन्दिर निर्माण की अपनी प्रतिबद्धता रख दी है। केन्द्र सरकार रामालय न्यास को जब जमीन सौंपेगी तब निर्माण आरम्भ हो सकेगा। यदि इसमें कोई खामी हुई तो न्यास के लोग न्यायालय जा सकते हैं, उसमें भी विलम्ब लगेगा।  अत: ट्रस्ट के मन्दिर निर्माण शुरू करने की प्रतीक्षा में विलम्ब नहीं होना चाहिए।

शंकराचार्य ने शुरू किया बालराममन्दिर का निर्माणकार्य:
अविमुक्तश्वरानंद ने कहा कि लोकभावना को ध्यान में रखते हुए स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने विगत मकर संक्रांति को सूर्य देवता के उत्तरायण होते ही मन्दिर निर्माण कार्य आरम्भ कर दिया है । बताया कि शास्त्रों के अनुसार नया मन्दिर वहां बनाया जाता है जहां पहले से कोई मन्दिर न हो। जहां पहले से ही कोई मन्दिर हो और वह जीर्ण-शीर्ण या भग्न हो गया हो तो उसे पुनर्निर्मित किया जाता है जिसे जीर्णोद्धार कहा जाता है।

शास्त्रों के अनुसार किसी मन्दिर का जीर्णोद्धार करना आरम्भ करने के पूर्व एक छोटे अस्थायी मन्दिर 'बाल मन्दिर' का निर्माण किया जाता है। उन्होंने आगे बताया कि बालमन्दिर चन्दन की लकड़ी से निर्मित किया जायेगा। जिसका आकार 1 लाख 21 हजार 2 सौ 21 फुट का होगा, जिसके मध्य रामलला विराजमान का 669 फुट का सिंहासन होगा जो कि स्वर्णमण्डित होगा। जिसके लिये देश के हर गांव से सोना एकत्र किया जायेगा।

रमेश उपाध्याय ने किया स्वर्ण दान:
काशी के अधिवक्ता पं रमेश उपाध्याय जी ने आज पत्रकार वार्ता के अवसर पर ही अविमुक्तेश्वरा नंद को एक ग्राम स्वर्ण का दान किया। काशी के ये पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने रामजन्मभूमि में निर्मित होने वाले स्वर्णमय मन्दिर के लिए स्वर्ण का दान दिया। सुन्दरवन के महन्थ महाराजमणि शरण सनातन महाराज ने 2100 सौ रुपये का स्वर्ण दान किया। इसी क्रम में 1100 सौ रुपये का स्वर्ण श्याम नारायण ग्वाल ने भी दान किया।