वाराणसी: महीनों से क्षतिग्रस्त और बदहाल, अपने ही संस्थान में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का घोर अपमान!

वाराणसी: महीनों से क्षतिग्रस्त और बदहाल, अपने ही संस्थान में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का घोर अपमान!

हरिश्चंद्र महाविद्यालय में महीनों से क्षतिग्रस्त और बदहाल पड़ी है भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रतिमा
राज्यमंत्री नीलकंठ तिवारी ने 15 अप्रैल 2017 को महाविद्यालय में स्थापित की थी उक्त 
प्रतिमा 24 जनवरी 2020 की रात आराजक तत्वों ने तोड़ डाली थी प्रतिमा

रिपोर्ट- अमरेन्द्र पाण्डेय

वाराणसी(रणभेरी): आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने सन 1866 ई. में जब हरिश्चन्द्र महाविद्यालय की नींव रखी तो उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके द्वारा बनाए गए विद्यालय में एक दिन उनकी ही घोर उपेक्षा होगी। अब इससे शर्मनाक और दुखद भला क्या हो सकता है कि महज पांच छात्रों के साथ शिक्षा की अलख जगाने और समाज को शिक्षित करने की संकल्पना से महाविद्यालय की स्थापना करने वाले युगपुरूष भारतेन्दु जी की प्रतिमा आज उन्हीं के महाविद्यालय में महीनों से क्षतिग्रस्त और बदहाल स्थिति पड़ी हुई है और किसी का उसपर ध्यान तक नहीं है। 

प्रतिमा के ऊपर बना हुआ आवरण भी क्षत-विक्षत और फटेहाल होकर प्रतिमा पर लटक कर मानो भारेतन्दु जी का उपहास कर रहा है कि देखिए आपके विद्यालय में ही आज आपकी कैसी दुर्दशा हो गई है कि कोई पूछने वाला तक नहीं है। दरअसल 15 अप्रैल 2017 को महाविद्यालय के छात्रसंघ भवन के सामने विद्यालय के संस्थापक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रतिमा छात्रसंघ प्रतिनिधि खुशबु सिंह, शुभम सेठ के साथ राज्यमंत्री नीलकंठ तिवारी स्थापित की थी।

24 जनवरी 2020 की रात में असामाजिक तत्वों ने भारतेन्दु की प्रतिमा तोड़ डाली। प्रतिमा के मुख और अन्य अंग क्षत विक्षत और टूट गए पर प्राचार्य ने उसके बाद भी यह नहीं माना कि किसी ने उसे तोड़ा है उन्होनें कहा कि ठंड की वजह से प्रतिमा टूटी है। जबकि एक अंधा व्यक्ति भी बता सकता है कि प्रतिमा ठंड से नहीं बल्कि किसी प्रहार से टूटी है। हालांकि प्रतिमा जैसे भी टूटी हो पर उसे उसी हालत में महज कुछ मसाला लगाकर लीपापोती कर छोड़ना कहां तक उचित है।

इस समय हालत यह है कि प्रतिमा तो क्षतिग्रस्त हैं ही उसके ऊपर लगाया गया आवरण भी टूट कर प्रतिमा के ऊपर लटक रहा है। अपने ही विद्यालय में संस्थापक के प्रतिमा की यह बदहाल तस्वीर वाकई बेहद पीड़ादायक है, पर विडंबना कि किसी जिम्मेदार की संवेदना इसको देखकर नहीं जग रही है।