तौफीक खान का ब्लॉग: कही रक्षक तो कहीं भक्षक फिर भी हम सबके हैं यही संरक्षक

तौफीक खान का ब्लॉग: कही रक्षक तो कहीं भक्षक फिर भी हम सबके हैं यही संरक्षक

लेखक: तौफीक खान

वाराणसी(रणभेरी): बात पुलिस महकमे की हो रही है। कहा जाता है कि सत्ता के इशारे पर चलने वाला यह महकमा हमेशा अधिनस्थ होकर अपनी कार्य को करता है, जिसके कारण लगातार इसके ऊपर आलनछन लगते हैं और पूर्ण रूप से अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने में असमर्थ दिखती है। सफेदपोश नेताओं की जी हजूरी और चरण वंदना के साथ प्रमोशन ड्यूटी में बदलाव, मनचाहा पोस्टिंग और तो और जनभावना को उनके अधिकार से कुचलकर उनके ऊपर ही धौंस के साथ ऐठन की भी कई इल्जाम नित निरंतर मिलते रहे हैं।

यह भी एक सत्य: गरिमामय उपस्थिति दर्ज करा कर मौके पर भगवान स्वरूप कार्य करने वाले यही रक्षक हमारे संविधान के तहत रहनुमा बन जाते हैं और अनेकानेक विपरीत परिस्थितियां होने के बावजूद भी पीड़ित को संभालने में पूर्ण सहयोग कर मददगार साबित होते हैं। दुश्वारियां चाहे कितनी भी हो लेकिन जहां इनकी वर्दी दिखती है, वहां इनकी साख मजबूती से अपने फर्ज के लिए जिम्मेदारी निभाकर इतिहास लिखते हैं। कई ऐसे उदाहरण मिले हैं जहां यदि पुलिस क्षणिक मात्र भी देर से घटनास्थल पर पहुंची तो बहुत बड़ी घटना हो सकती थी, लेकिन उपस्थिति के कारण वहां माहौल बदल जाता है। कभी-कभी तो मानव रूप में यह देव के समान कार्य कर जाते हैं।

पुलिस का फिसड्डी होना मजबूरी या दौलत ईमान: अक्सर देखा जाता है कि चंद लोगों की वजह से रीति-रिवाज और संस्कार जीवित रहता है। चाहे कितने भी बड़ी से बड़ी कठिनाइयां हो लेकिन वह अपनी नीति और नियत को नहीं बदलते अपने कर्म को दिव्य रूप से फर्ज मानकर निभाते हैं, चाहे उनके लिए खुद को निछावर करना पड़ा हो। उन्होंने खुद को साबित किया है। आज के इन दिनों में आखिर पुलिस फिसड्डी क्यों यह बहुत बड़ा सवाल है क्योंकि समाज के रक्षक के रूप में यह संगठन निरंतर काम करता आ रहा है और धीरे-धीरे इसमें काफी बदलाव भी आ चुका है। चाहे टेक्निकल स्तर पर हो या भर्ती प्रक्रिया हो या अन्य तरीके का अपराध से लड़ने की क्षमता कि दुरुस्त करने की बात हो लेकिन फिर भी आज इस महकमे में खुदारी की बहुत कमी आई है जिससे कि कार्य पर भी प्रभाव पड़ा है। किसी एक थाना क्षेत्र की बात करें तो आप अक्सर देखते हैं कि जिस तरीके से पहले गस्त और ड्यूटी इनकी दुरुस्त पहचान होती थी, आज वही खानापूर्ति बन फर्ज निभा रही है।

बनारस की फिजा में चुनिंदा अधिकारी ही अपनी सेवा को फर्ज समझते हैं, नहीं तो यहां तो चाहे शराब की तस्करी हो, गौ तस्करी, जुए के अड्डा का संचालन, हुक्का बार का संचालन या अतिक्रमण अवैध स्टैंड का संचालन सभी कार्यों में इनका सहयोग बना हुआ है तो समाज के प्रति फिसड्डी होना तो लाजमी है।

आदेश की अवहेलना: जहां उत्तर प्रदेश शासन द्वारा निरंतर पुलिस विभाग में  कड़ा रुख अपनाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई बदलाव किए लेकिन जमीनी स्तर पर यह बदलाव शून्य साबित हो रहा है, चाहे पुलिस की कार्यशैली या व्यवहार की बात हो या बरसों से जमे विभागीय घनानंद की। वर्षों से चली आ रही पोस्टिंग का खेल जिसमें बड़े-बड़े मंत्री और अधिकारियों का होता है। विभाग चाहे जितनी भी रिपोर्ट पेश कर ले लेकिन हकीकत यह है कि फर्जी खुलासे और निरपराध को अपराधी बनाना भी इनका कार्य शैली बन चुका है। 

यही नहीं इन दिनों जो कलम पर भी घात लगाए बैठे अधिकारी कुचलने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं लेकिन कलम की भी अपनी साख और और शान है, जिसकी रवानी दुनिया के लिए सच को जिंदा रखने की ताकत के साथ ऊर्जा भरने का पूर्ण बहाव होता है जिसमें जनमानस और समाज की नैतिक जिम्मेदारी निर्वहन की अपनी क्षमता है। यह लेख किसी व्यक्ति विशेष या किसी को चिन्हित करने के लिए नहीं बल्कि समाज के उन बिंदुओं को दर्शाने के लिए लिखा गया है, जो निरंतर घटित हो रही हैं और बदलाव के साथ महसूस हो रहा है।