कामयाब सफर: टाइपराइटर की खट-खट से, सेन्ट्रल ऐकेडमी की चैखट तक 

कामयाब सफर:  टाइपराइटर की खट-खट से, सेन्ट्रल ऐकेडमी की चैखट तक 
कामयाब सफर:  टाइपराइटर की खट-खट से, सेन्ट्रल ऐकेडमी की चैखट तक 

अनन्त-आनन्द की जोड़ी नें कधे से कंधा जोड़ा मेहनत के दम पर हवाओं का रुख मोड़ा

वाराणसी (रणभेरी)। दौर बीसवीं सदी के अवसान का। देश कम्प्यूटर युग में प्रवेश कर रहा था। बदलाव के इस जमाने में बाकी के टाइपिंग संस्थानों की तरह नगर के सबसे भरोसेमन्द टाइपिंग स्कूल चतुर्वेदी टाइपराइटिंग संस्थान (गिरजाघर) की टाइपिंग मषीनें भी थक-हारकर अण्डरकवर होने लगी थीं। अनिश्चितता की उलझनों ने संस्थान के अधिश्ठाता पं0 कमलेश चतुर्वेदी के माथे पर बल ला दिए थे। ठीक इसी समय इन विशम परिस्थितियों से दो-दो हाथ करने का मजबूत इरादा लेकर कर्मक्षेत्र में उतरे चतुर्वेदी जी के बड़े बेटे अनन्त चतुर्वेदी।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एमएससी (1986), माॅस कम्यूनिकेशन की सुनहरी उपाधियां लेने के बाद पीएचडी सहित आइएएस की तैयारी में जुटे इस जोषीले युवा के सामने सारा आकाश पड़ा था मुठ्ठी में बांधने को, कॅरियर को बुलंदियां देकर उपलब्धियों के स्वर्ण सूत्र साधने को। ,,, मगर बस एक धुन मन में समाई तो खानदान की परम्परा के अनुसार शिक्षा क्षेत्र में ही पहचान व मुकाम बनाने की जिद एक संकल्प की तरह दिल में उतर आई।

दौर वर्ष 1993 का इरादे प्रकल्प (प्रोजेक्ट) का रूप लेने को आतुर किन्तु पास में धूल खा रही टाईप मषीनों के सिवा पंूजी के नाम पर एक धेला नही। ऐसे में दृढ़ संकल्प बना तिनके का सहारा। बरसों से कमाई साख व सरल व्यवहार काम आया। एक छोटे से आग्रह पर भी शुभेच्छुओं ने बेहिचक मदद का हाथ आगे बढ़ाया और चतुर्वेदी ग्लास व प्लाइवुड के नाम का चमचमाता बोर्ड शहर के व्यावसायिक फलक पर धूमकेतु की तरह उभरता चला आया।

महज तीन वर्ष ही बीते थे कि संस्थान के प्रेरणा पुरुष पं0 कमलेश चतुर्वेदी अनन्त यात्रा पर निकल पड़े। मानो समय के साथ टिक-टिक करती घड़ी के सेकेन्ड वाली सुई ही इस कठिन मोड़ पर जैसे ठिठक गई। कहते हैं अनन्त जी यह वक्त था कितना कठिन बयाॅं नही हो सकता। वक्त की नजाकत को समझते हुए अभी तक सलाहकार की भूमिका में रहे छोटे भाई आनन्द चतुर्वेदी को सक्रिय भूमिका में बड़े भाई अनन्त के कन्धे से कन्धा जोड़ना पड़ा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अहम ओहदेदारियां व अपने राजनीतिक भविश्य को ताक पर रख कर अपने राजनीतिक भविष्य को वक्त की खूटी पर टांग कर तयशुदा दिशा को दूसरी ओर मोड़ना पड़ा।

बताते हैं युवक कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष व केन्द्रीय जेल के विजिटर रहे आनन्द शिक्षा क्षेत्र में कुछ कर गुजरने की ललक शुरू से ही थी। छत पर टहलान के दौरान बड़े भैया से एक विमर्ष हुआ और यह तय पाया गया कि जो भी करना है पूरे मनोयोग के साथ करना है और हम सबकी कल्पना के अनुरूप आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कारों की साज सहेज के वायदे के साथ सेन्ट्रल एकेडमी की पहली शाखा गिरजाघर क्षेत्र की पहचान बन गई। चतुर्वेदी शिक्षण समूह ने मील का पहला पत्थर गाड़ दिया।

बताते हैं चतुर्वेदी बन्धु आज गिरजाघर के अलावा रामापुरा, गुरुधाम व सामने घाट पर विद्यालय की शाखाएं पूर्ण वातानुकूलित भवनों व आधुनिकतम संसाधनों के साथ न सिर्फ चल रही हैं वरन सफलता के नित नए कीर्तिमान बना रही हैं। लगभग एक लाख स्क्वायरफीट के विशाल परिसर में निर्माणाधीन सिंधोरा स्थित संस्थान का नया शिक्षा संकुल किफायती किन्तु सर्वोत्तम शिक्षा की मिसाल बनकर जल्द ही सामने आने वाला है। सीबीएससी बोर्ड से इन्टर तक की शिक्षा के इस महत्वपूर्ण केन्द्र की काशीवासियों को बेसब्री से प्रतीक्षा है।

चतुर्वेदी बन्धु संस्थान की इस चतुर्दिक सफलता का श्रेय अपने मित्रों, शुभेच्छुओं व कर्मचारियों को तो देते ही हैं, इस अनथक यात्रा में कदम से कदम मिलाकर साथ चलीं अपनी हमसफर श्रीमती सुमन चतुर्वेदी (निदेशक) व श्रीमती मधु चतुर्वेदी (निदेशक) की बेजोड़ साझेदारी को पूरा महत्व देते हैं। नई पीड़ी कृतेश (एमबीए), रिशान्त (एमबीए), रिशिका (बीटेक) व रिशभ (बीबीए) सो भी उम्मीद रखते हैं कि वे जहाँ भी जाएंगे अपने परिवार अपने संस्थान व संस्थान के पितृ पुरुष स्व0 कमलेश चतुर्वेदी के सिद्धान्तों व आदर्शों से बिना डिगे अपना मुकाम खुद बनाएंगे।