दर्दनाक: कुछ ऐसी है वाराणसी के 'विकास' की दुनिया, न इलाज के हैं पैसे और ना ही कोई सहारा

दर्दनाक: कुछ ऐसी है वाराणसी के 'विकास' की दुनिया, न इलाज के हैं पैसे और ना ही कोई सहारा

विश्वेश्वरगंज के विकास का लीवर हो चुका है डैमेज, शरीर में खून की भी है भारी कमी
घर में नहीं है फूटी कौड़ी, मां-बाप की हो चुकी है मृत्यु, साथ में हैं केवल 75 साल की दादी
कबीरचौरा अस्पताल में किया गया भर्ती, पर इलाज में हो रही घोर लापरवाही
प्राइवेट हॉस्पिटल में जाने के लिए दबाव बना रहे डॉक्टर

रिपोर्ट: अमरेन्द्र पाण्डेय

वाराणसी(रणभेरी): इस संसार में बीमारी ऐसी चीज है जो बड़े से बड़े धनाढ्य लोगों का भी सड़क पर ला सकती है और जब कभी यह भयानक बीमारियां किसी गरीब को अपने चंगुल में फांस लेती हैं तो उसका कष्ट दोगुना हो जाता है। उसके आंखों के सामने एकाएक अंधेरा छा जाता है। दिन-रात मेहनत कर खून-पसीने से एक-एक पैसा जुटाने वाले गरीब को जब कोई बीमारी घेरती है तो अपनी जिंदगी भगवान को समर्पित करने के सिवा उसके पास कोई चारा कोई उपाय नहीं होता। ऐसा कई बार हुआ है कि पैसे के अभाव में तड़प-तड़प कर एक गरीब अपने प्राण त्यागने पड़ते हैं। ठीक ऐसा ही एक गरीब युवक कबीरचौरा अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है। न उसके पास इलाज के पैसे हैं और न ही मदद करने वाला कोई सहारा है। 

ये कहानी है k47/338 कतुआपुरा, विशेश्वरगंज निवासी 20 वर्षीय विकास प्रजापति की, जिसका लीवर डैमेज हो गया है। शरीर में महज 4.0 होमोग्लोबिन बचा है। बीमारी और खून की कमी से उसका पूरा शरीर मात्र हड्डीयों का ढांचा बनकर रह गया है। बीमारी की वजह से 20 साल का यह युवक देखने में महज 10 साल के बच्चे की तरह लग रहा है। विकास अपने घर का अकेला कमाऊ सदस्य है। वह मोमोज बेचकर अपना और अपनी 75 वर्षीय दादी का खर्चा चलाता था। उसके मां-बाप की काफी पहले ही मृत्यु हो चुकी है।

तीन महीने पहले अचानक असहनीय दर्द के बाद स्थानीय लोगों ने उसे कबीरचौरा अस्पताल में भर्ती कराया, जहां जांच और दवा में कुछ रखे पैसे भी समाप्त हो गए। किसी तरह उसी हालत में घर आया और बिस्तर पर ही पड़ा रहने लगा। 4 जून गुरूवार को अचानक उसकी तबीयत फिर से खराब हो गई। स्थानीय निवासी आशीष यादव और अन्य लोगों ने उसे कबीरचौरा हॉस्पिटल में भर्ती कराया। जहां चिकित्सकीय लापरवाही की वजह से उसकी हालत और भी बदतर होती जा रही है। वह श्री शिवप्रसाद गुप्त मंडलीय चिकित्सालय के वॉर्ड नं.-7 में तीन दिनों से भर्ती है, पर तीन दिनों में केवल एक बार जूनियर डॉक्टर ने उसे देखा इलाज करने की बजाय यह कहा कि यहां इलाज नहीं हो पाएगा किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में इसे ले जाओ। 

​​​​​​​​इलाज के नाम पर मंडलीय चिकित्सालय में सुबह-शाम बस उसे एक-एक बोतल पानी चढ़ाया जा रहा है। एक ओर योगी सरकार प्रदेश में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का दावा करती है। वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के मंडलीय चिकित्सालय में एक गरीब के साथ ऐसी लापरवाही दावों की जमीनी हकीकत है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सरकार के पास इतनी सुविधाएं और दवा नहीं है कि एक गरीब का इलाज न हो सके? और यदि है तो इस गरीब लड़के का इलाज किन कारणों से नहीं हो पा रहा है? 

‘बाबू बचा ल हमार बचवा के’:

जिंदगी और मौत से जूझ रहे विकास के पास बस उसकी 75 साल की दादी है। जिनका स्वास्थ्य भी बेहद खराब है। जब कोई भी डॉक्टर, कर्मचारी या कोई व्यक्ति विकास के बेड के पास आ रहा है तो उसकी दादी यही कह रही हैं कि ‘बाबू बचा ला हमरे बचवा के, इहे एगो हमरे जीए क सहारा बा’। पर अफसोस किसी डॉक्टर को उस गरीब की दशा पर तरस और दया नहीं आ रही है। उल्टे उसे अस्पताल से जाने का बार-बार दबाव बनाया जा रहा है।