Lockdown में मयखाना: टूटी तंद्रा, छंट गई धुंध, चातक के कंठ पड़ी स्वाति की बूंद

Lockdown में मयखाना: टूटी तंद्रा, छंट गई धुंध, चातक के कंठ पड़ी स्वाति की बूंद

लेखक: कुमार अजय

मदिरालयों पर ऐसी उमड़ी भीड़ मानों छुट्टी हुई हो पूरी छुट्टी की

वाराणसी(रणभेरी): कोरोना काल के राहू की महादशा के रूप में आने और आठवेँ घर में बैठे केतु के प्रभाव से स्वाति नक्षत्र की तरह अस्त हो जाने जैसा अशुभ फलादेश साबित हुआ, मयकशोें के लिए लॉकडाउन के दौरान मदिरालयोंं का कपाट बंद हो जाना। जिनके ललाट पर साक्षात चंद्रमा बिराज रहे थे उनकी तो फिर भी गनीमत। दान-दक्षिणा के प्रताप से प्राप्त कुछ बूदों से प्राणधारण किये रहे बेचारे पुण्यात्माओं की तरह। 

विपदा तो उन बेचारे जातकों पर जो कुंडली के चक्र के भरोसे रह गए। फिर भी साधुवाद कि इस कठिन काल की पीड़ा को जन्म-जन्मातर के प्यासे चातक पंछी की तरह पीऊ-पीऊ रटते अहिल्या शिला  की तरह सह गए। जाहिर है इस कातर पुकार का विधना के कानों तक तक पहुचना तय था। सो विधि की प्रेरणा से सल्तनत की निद्रा टूटी। बिल्ली के भाग से छींके की गांठ टूटी। 

पूरे 42 दिनों के बाद  शासन-प्रशासन को स्वाति के उदय की आपात घड़ी निकालनी पड़ी। बहाना कोषागार की साढ़े साती का ही सही निकालनी पड़ी जादू की छड़ी। फिर क्या था, देवताओं की आकाशवाणियां हुई और राजा कंस के कारागार की तरह सांमवार की सुबह सुरालयों के बंद द्वार खुल गए। चेतनाशून्य पड़े चातकों की तंद्रा टूटी और आनंदाश्रुओं के अविरल प्रवाह से उदासी के स्याह साये तनजेब की उजले थान की तरह धुल गए।

अहा क्या विहंगम दृश्य! मानों हर राह जा कर मिल रही हो मदिरालयों से। ऐसी धमगज्जर मानों सभी प्रथमिक विद्यालयों मे एक साथ पूरी छुट्टी की घंटी बजी हो और बोझिल कक्षाओं की बंदिशों से उकताए छात्र खुली हवा में दौड़ पड़े हों उन्मुक्त क्षितिज को बाहों में बांधने, अपना एकमेव लक्ष्य साधने। बावजूद इस उत्सवी उल्लास के सुराप्रेमियों की इस चैतन्यता की चर्चा आवश्यक कि उमंगों के इस रेले में भी अनुशासन का बंध कहीं नहीं टूटा। भारी भीड़ के बाद भी सामुदायिक दूरी के नियम का सूत्र पल भर के लिए भी हाथ से नहीं छूटा।

कहने की बात नहीं कि इन लंबी-लंबी पंकितयों  में सभी सज्ञान, सभी सयाने। सभी को ज्ञात है कतार टूटने के माने। श्रीमान फलाने जी समझा रहे ढेमका जी को- अरे यार! पजामे में रहा नाहीं त कउनो हाकिम चल आई। एक ठे तोहरे चलते फिन लॉक अउटवा क भाव चढ़ जाई। ओकरे बाद एकठे बंदी फिर झेला। फिर आठों दंड एकादशी अउर फिर वही सूखा क झमेला। हालांकि ढेमका जी कि अपनी राय थी किे वे चाहे जिस तरह पेश आवें आज वे वंदनीय हैं क्यों कि सरकार भी उनकी महत्ता जान गई है। उनके अंशदान के बिना देश के विकास का पहिया जाम ही रह जाएगा यह परम सत्य सारी दुनिया पहचान चुकी है। ऐसे में उनकी  राय खाली न जानी चाहिए। लोगों को खुद आगे आकर मयकशों के सम्मान में भी ताली-थाली बजानी चाहिए।

समझदानी के धनी बहुत लोग ऐसे भी नजर आए जो कतारों से सौ-पचास मीटर दूर वीरासन लगाए हुए थे। पता चला परहेज सार्वजनिक कतार से है अतएव इस रेलम-पेल में पठ्ठों की ड्यूटी लगाए हुए थे। इस हड़बोंग से दूर खड़े तमाशा देख रहे बीहड़ गुरु ने इस पूरे परिदृश्य का आकलन कर के के आज सायं को नगर की संभावित हलचलों का जो अगम बताया वह शाम को वाकई मुहल्ले-मुहल्ले डोल रहा था। शहर का हर तीसरा आदमी काशिका और खड़ी हिंदी छोड़ कर बस अग्रेजी बोल रहा था। इति---सोमरस मुकित कथा...