अजीत सिंह का ब्लॉग: जेएनयू पर हमला, संघ-बीजेपी सरकार का सत्तापोषित षड्यंत्र!

अजीत सिंह का ब्लॉग: जेएनयू पर हमला, संघ-बीजेपी सरकार का सत्तापोषित षड्यंत्र!

    अजीत सिंह   

 लोकतंत्र की हत्यारी सरकार के इशारे पर देश में आज नफरत का जो बीज बोया जा रहा है     इसकी जहरीली फसल को अब भी नष्ट नहीं किया गया तो देश का अमन,चैन और सौहार्दृ     दशकों के लिए दफन हो जाएगा। बिना किसी लाग लपेट के जेएनयू की घटना पर सीधी बात कहना चाहूंगा कि इसे छात्रों के दो गुटों के बीच का मामला बताने वाले लोग गद्दार हैं। मुख्यधारा की मीडिया से जुड़े लोग तानाशाही हुकुमत की दलाली और चापलूसी में मस्त है। जिन इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनलों के बिकाऊ एंकरों को देश की आवाम बेबाक पत्रकार समझती है दरअसल वो मक्कार हैं। सम्प्रति इस देश में राष्ट्रवाद के नाम पर भेद-भाव करने वाले लोग ही असल में देशद्रोही हैं।

जरा गौर करिएगा, अभी चंद रोज पहले ही दिल्ली के एक कार्यक्रम में अमित शाह ने कहा था, ‘कांग्रेस की अगुवाई वाले ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ को दिल्ली की शांति भंग करने के लिए सबक सिखाया जाना चाहिए।’ मंत्री जी के इस सार्वजनिक बयान के एक सप्ताह बीतते ही नकाबपोश गुण्डों ने देश और दुनिया में प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शिक्षकों और छात्र-छात्राओं पर कातिलाना हमला कर गृहमंत्री के बयान को अमलीजामा पहना दिया। नकाबपोश बदमाशों ने प्रदर्शनकारी छात्रों को डंडे और लोहे की रॉड से बुरी तरह पीटा। वे करीब ३ घंटे तक कैंपस में कोहराम मचाते रहे। १०० नंबर डॉयल करने पर भी पुलिस नहीं आई। जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष समेत कई शिक्षक और ३५ छात्रों को गंभीर रूप से घायल कर दिया। एम्स ट्रामा सेंटर में भर्ती छात्र-छात्राओं को कई जगह फ्रैक्चर हैं।

छात्रों की माने तो संघ-बीजेपी सरकार जामिया की तरह जेएनयू के छात्रों को भी सबक सिखाना चाहती थी। इसलिए हमले को विश्वविद्यालय प्रशासन, पुलिस और विद्यार्थी परिषद के गुंडों ने मिलकर अंजाम दिया है। घटना के पहले  व्हाट्सअप ग्रूप में एक मैसेज का आदान-प्रदान हुआ- ‘बिल्कुल, एक बार ठीक से आर पार करने की जरूरत है। अभी नहीं मारेंगे सालो को तो कब मारेंगे, गंद मचा रखी है कौमियों ने।’ घटना के बाद दूसरे मैसेज में खुशी जाहिर करते हुए कहा गया कि ‘जेएनयू में हम सभी कितने खुश हैं। मजा आ गया। इन साले देश द्रोहियों को मार कर।’ यह बात सही है कि हमलावर अपने चेहरे को नकाब से ढंके थे। लेकिन बाकी सारी चीजें और घटनाएं शीशे की तरह साफ है। लोकतंत्र के आइने में छात्र-छात्राओं पर हमला करने और साजिश रचने वाले हर शख्स का चेहरा कैद है। यह अलग बात है कि दिल्ली पुलिस अभी तक एक भी हमलावर की गिरफ्तारी की कौन कहे, पहचान तक नहीं कर पाई है।

भारत के अभिमान जेएनयू जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में छात्रों पर हमला लोकतंत्र की अत्मा पर हमला है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। जेएनयू ने देश के दूर- दराज इलाकों से आने वाले सामान्य, अति सामान्य, वंचित परिवारों से आने वाले अनगिनत युवक-युवतियों की ज़िंदगी को संवारा है, असंख्य प्रतिभाओं को निखारा है, न जाने कितने गुदड़ी के लाल दिए हैं। पिछले छह वर्षों से अनवरत जेएनयू को बदनाम करने, उसे अलगाव में डालने, उसके नेतृत्व को कुचल देने, उसके शैक्षणिक ढाँचे को तहस-नहस कर देने और अंतत: सामान्य, वंचित परिवारों से आने वाले छात्रों को प्रवेश से रोक देने के लिए फीस में अनाप-शनाप बढ़ोत्तरी की साजिश की गईं। लेकिन जब जेएनयू को फतह करने की सारी साजिशें नाकाम हो गईं, जब जेएनयू को वैचारिक-राजनैतिक मोर्चे पर पराजित नहीं किया जा सका, जब प्रशासनिक तिकड़मों से, आंदोलनों पर भीषण पुलिसिया जुल्म से नहीं जीता जा सका तब रात के अंधेरे में जेएनयू पर सुनियोजित हमला किया गया। 

मुख्यधारा की मीडिया जिस तरह से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर इसे छात्रों का आपसी संघर्ष बताने पर लगी है बात दरअसल उतनी नहीं है। इसके पीछे संघ-भाजपा की गहरी साजिश है। घटना के बाद जिस तरह से मीडिया देश को गुमराह करने की कोशिश में लगी है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है।

संघ-बीजेपी सरकार का लक्ष्य मात्र जेएनयू की गरिमा और अस्मिता को गिराना नहीं है बल्कि वह जेएनयू और जेएनयू जैसे संस्थानों और सोच के अस्तित्व को ही जमींदोज करना चाहती है। दरअसल, जेएनयू कुछ सौ एकड़ में सीमित एक संस्थान भर नहीं है। जेएनयू एक विश्वविद्यालय ही नहीं एक विचार और दर्शन भी है जो संघ के विचार-दर्शन के एकदम विपरीत खड़ा है। एक नहीं जेएनयू की कई खूबियां संघ परिवार को बेचैन करने वाली हैं। जिसमें परिसर के अधिकांश प्राध्यापक-छात्र और शोधार्थियों का वाम और प्रगतिशील विचारों और मूल्यों से जुड़ा होना है। लाख कोशिशों के बाद भी छात्रसंघ पर कब्जा न जमा पाना। जेएनयू की सस्ती शिक्षा शिक्षा के निजीकरण में आज भी रोड़ा बना हुआ है।

जेएनयू एक हद तक मिनी इंडिया है जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर सुदूर दक्षिण के केरल और तमिलनाडु और कश्मीर के छात्र शिक्षा लेते हैं। जेएनयू संघ-बीजेपी के विरोधी पं. जवाहर लाल नेहरू के नाम पर है। संघ-बीजेपी सरकार जेएनयू और जवाहर लाल नेहरू के ऊपर छह वर्षों से अतार्किक और अधकचरा आरोप लगा कर जब उनके गरिमा और उपयोगिता को नहीं कम कर सकी तो अब उसके अस्तित्व को ही मिटाने का सत्तापोषित षड्यंत्र कर रही है।