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बुधवार 01-अगस्त-18
उपसभापति चुनाव में उड़ी नगर निगम अधिनियम की धज्जियां


आखिरकार बीते ६ वर्षों के लंबे अंतरालके बाद वाराणसी नगर निगम की कार्यकारिणी समिति में उपसभापति की कुर्सी की खातिर चुनाव हो ही गया। जी हां लम्बे इंतजार के बाद अब इस कुर्सी पर तीन बार से भाजपा के पार्षद पद की जिम्मेदारी निभा रहे नरसिंह दास का बैठना तय हो गया है।

बीते दिनों वाराणसी नगर निगम में कार्यकारिणी समिति की बैठक में हुए उपसभापति के चुनाव में काफी देर तक चली रस्सा - कस्सी के बाद नरसिंह दास के मस्तक पर बमुश्किल जीत का सेहरा बांधा गया। जितनी सच्चाई इस बात में है कि वाराणसी नगर निगम में उपसभापति के रूप में भाजपा पार्षद की जीत मेयर के वीटो पावर से ही संभव हुई है उतनी ही सच्चाई इस बात में भी है इस जीत के खातिर भाजपा पार्षदों सहित महापौर एवं नगर आयुक्त को पसीना-पसीना होना पड़ गया था। विपक्षियों की जोरदार बहस एवं तर्क के आगे इस चुनाव का परिणाम घोषित करने में सत्ता पक्ष की हालत खराब हो गई थी। दरअसलनगर निगम के उपसभापति के चुनाव में बुधवार को उस समय बड़ी ही रोमांचक स्थिति पैदा हो गयी जब राजमंदिर वार्ड के निर्दलपार्षद अजीत सिंह ने विपक्ष के साझा मंच की ओर से अपना नामांकन दाखिलकर दिया ।

पहले तो यह कयास लगाया जा रहा था कि इस चुनाव में उपसभापति की कुर्सी पर भाजपा निर्विरोध काबिज होगी लेकिन ठीक चुनाव के दिन ही नामांकन दाखिल करने की अवधि में कांग्रेस पार्षद रमजान अली ने जब अजीत सिंह के नाम का प्रस्ताव रखा और सपा पार्षद प्रशांत सिंह पिंवूâ ने इस प्रस्ताव का समर्थन कर दिया तो भाजपा पार्षदों के चेहरे का रंग अचानक फीका सा पड़ गया। अजीत सिंह का नामांकन होने के साथ ही भाजपा खेमे में परिणाम को लेकर सुगबुगाहट बढ़गयी। चूकि निर्विरोध चुनाव सम्पन्न कराने की उम्मीद से नगर निगम पहुचे भाजपाई जानते थें कि विपक्ष की दावेदारी होने पर इस चुनाव को अपने पक्ष में कर लेना उनके लिए आसान नही होगा। एक पलको भाजपा पार्षदों सहित महापौर को ऐसा लग रहा था कि अजीत सिंह अपना नामांकन वापस ले लेंगे मगर यह भी नहीं हुआ। अंतत: उपसभापति पद के लिए मतदान कराने की स्थिति उत्पन्न हो गई। इस चुनाव में कार्यकारिणी समिति के कुल१२ सदस्यों को वोट देना था। १२ सदस्यों के वोट में २ वोट अवैध घोषित हो गए और बाकी बचे १० वोटों में ५-५ बराबर वोट नरसिंह दास एवं अजीत सिंह को मिले। मतगणना के दौरान सबसे पहले भाजपा प्रत्याशी के १ वोट को अवैध पाया गया जिस पर भाजपा पार्षदों के चेहरे की हवाइयां उड़ गई। एक पलको लगा कि अजीत सिंह की जीत सुनिश्चित हो गई मगर मतगणना के दौरान ही १ वोट और अवैध घोषित हुआ जो अजीत सिंह के पक्ष में जाना था ऐसे में दोनों उम्मीदवारों की स्थिति बराबर हो गयी और आसान समझा जा रहा यह चुनाव बड़े ही रोमांचक मोड़ पर जा पहुचा। ऐसे में दोनों प्रत्याशियों को एक समान वोट मिलने पर निर्णय की स्थिति कठिन हो गई। इस पर भाजपा पार्षदों ने दावा किया कि महापौर को वोट देने का अधिकार है जिसके आधार पर भाजपा प्रत्याशी की जीत ही होनी है लेकिन इस पूरी प्रक्रिया से अनजान व पहली बार रूबरू हो रहे नगर आयुक्त के लिए यह आसान नहीं था वह इस बात का निर्णय नहीं ले पा रहे थें कि भाजपा प्रत्याशियों की मांग जायज है या नाजायज। वहीं अजीत सिंह ने दावे के साथ महापौर के वोट का विरोध किया। अजीत सिंह ने बाकायदा नगर निगम अधिनियम १९५९ की तमाम धाराओं का हवाला देते हुए नगर आयुक्त को लाटरी द्वारा रिजल्ट घोषित करने के लिए कहा, इस बात को लेकर कार्यकारिणी समिति के कक्ष में काफी देर तक गहमागहमी की स्थिति बनी रही। अजीत सिंह के दावों पर नगर आयुक्त ने काफी देर तक विचार किया। नगर निगम अधिनियम मंगाकर सभी अधिकारी इस बात का फैसला करने में लग गए कि क्या सही है और क्या गलत? अजीत सिंह ने बाकायदा नगर निगम अधिनियम की धारा १२ (३-क), धारा ५२ व धारा ७३ का हवाला देते हुए नगर आयुक्त के समक्ष अपनी बात रखी कि किसी भी सूरत में बराबर की स्थिति में वोट देने का अधिकार महापौर को नहीं है बल्कि बराबर की स्थिति में एक मात्र लॉटरी द्वारा ही निर्णय किया जाना न्याय संगत व संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। अजीत सिंह ने महापौर से भी कहा कि लॉटरी द्वारा यह निर्णय किया जाना चाहिए की विजेता किसे घोषित किया जाएगा। लेकिन शासन और सत्ता के खिलाफ जाकर यदि नगर आयुक्त इस मामले में फैसला देते तो निश्चित ही उन्हें जवाब देना पड़ता । भाजपा पार्षदों के साथ-साथ महापौर लॉटरी सिस्टम से निर्णय कराने के पक्ष में नहीं थी। क्योंकि किसी भी सूरत में भाजपा इस चुनाव में रिस्क लेना नहीं चाहती थी उन्हें डर था कि यदि उपसभापति की कुर्सी पर विपक्ष की ओर से दावेदारी कर रहे अजीत सिंह की जीत हो गई तो ऊपर जवाब कैसे देंगे। यही कारण है कि किसी भी तरीके से भाजपा के लोग इस चुनाव में जीत का सेहरा अपने उम्मीदवार के सर पर बांधने को आतुर थें। कार्यकारिणी कक्ष में अजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत किए गए अधिनियम एवं तर्कों के आगे खुद को हारता हुआ देख भाजपा पार्षदों ने पूर्व के वर्ष २००७ में हुए उपसभापति के चुनाव की प्रक्रिया का हवाला देना शुरु कर दिया और २००७ में कुछ इसी प्रकार की स्थिति बन जाने का हवाला देकर तत्कालीन महापौर कौशलेंद्र सिंह के समय हुए उपचुनाव की दुहाई दे देते हुए इस चुनाव में भी भाजपा के पक्ष में फैसला कराने हेतु नगर आयुक्त पर जोरदार तरीके से दबाव बनाने लगे। अब इस चुनाव प्रक्रिया से पहली बार रू-ब-रू हो रही महापौर नए नगर आयुक्त के समक्ष बड़े ही कश्मकश की स्थिति पैदा हो गई।

अंतत: सत्ता की ताकत के बल पर इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को जीत का सेहरा पहनाने को बेताब भाजपाइयों ने पुराने फैसले को आधार बनवाया और इसके बाद महापौर ने नगर आयुक्त की सहमति से नगर निगम अधिनियम के नियमों को नजर अंदाज करके पुरानी परम्परा का पालन करते हुए भाजपा प्रत्याशी नरसिंह दास को नगर निगम के उपसभापति के रूप में निर्वाचित घोषित कर दिया। इस पूरे प्रकरण में निर्दलपार्षद अजीत सिंह सहित विपक्ष के सपा व कांग्रेस पार्षदों का आरोप था कि नगर निगम अधिनियम को ताक पर रखकर पुरानी परंपराओं के आधार पर किया गया यह फैसला पूर्णतया गलत और लोकतंत्र की हत्या है। विपक्षियों ने इसे पूर्ण रूप से महापौर का तानाशाही रवैया बताया।

अजीत सिंह,कार्यकारिणी सदस्य व नेता निर्दल पार्षद दल

श्रीमती मृदुला जायसवाल के रूप में एक शिक्षित महापौर से बड़ी उम्मीदें थीं। यह भरोसा था कि निश्चित रूप से वाराणसी नगर निगम में अब संवैधानिक व्यवस्थाओं के आधार पर फैसले होंगे। मगर अफसोस इस बात का है कि सत्ता के प्रभाव व दबाव में आकर महापौर ने स्वविवेक से निगम अधिनियम का मान रखते हुए फैसला करने के बजाए पुरानी एवं गलत परम्परा का निर्वहन किया। महापौर एवं नगर आयुक्त के फैसले से संवैधानिक व्यवस्था को चोट पहुंची है, संविधान की आत्मा को चोट पहँुची है। मैं पूरी प्रक्रिया के दौरान संयम के साथ पैâसले का इंतजार कर रहा था मुझे पूर्ण विश्वास था कि एक शिक्षित महापौर होने के नाते उनका निर्णय न्यायपूर्ण होगा। जीत और हार अपनी जगह है इस चुनाव में निश्चित रूप से भाजपा की तथाकथित जीत हुई परंतु शहर की प्रथम नागरिक, सदन के अध्यक्ष महापौर के नैतिकता की हार हो गई।

अजीत सिंह,कार्यकारिणी सदस्य व नेता निर्दल पार्षद दल

-सीताराम केसरी,नेता- पार्षद दल एवं महानगर अध्यक्ष(कांग्रेस)

महापौर ने कहा था कि हर मसले पर सबको साथ लेकर चलेंगे। सर्वसम्मति से निर्णय लेंगे। पक्षपात नहीं होगा। परंतु आश्चर्य होता है कि महापौर अपनी बातों से इतनी जल्दी मुकर गई। उपसभापति के चुनाव से पूर्व महापौर ने विपक्ष से बात करना भी मुनासिब नहीं समझा और इस भ्रम में विपक्षियों को नजरअंदाज कर दिया कि बहुमत उनके पास है। हम गलत नीतियों के साथ नहीं है।

-सीताराम केसरी,नेता- पार्षद दल एवं महानगर अध्यक्ष(कांग्रेस)
अमरदेव यादव,पूर्व उपसभापति  नगर निगम वाराणसी

नगर निगम अधिनियम १९५९ की धारा १२ (३-क) के अनुसार नगर निगम में किसी निर्वाचन में मत बराबर होने की दशा में निर्वाचन अधिकारी लॉटरी द्वारा निश्चय करेगा और उस व्यक्ति को निर्वाचित घोषित करेगा जिस के पक्ष में लॉटरी पड़ा हो। यही नहीं नगर निगम अधिनियम १९५९ की धारा ७३ में भी यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि किसी निर्वाचन में किन्ही दो उम्मीदवारों को बराबर-बराबर मत प्राप्त हो तो ऐसे में उम्मीदवारों के बीच लॉटरी द्वारा यह निर्णय किया जाएगा कि किस से निर्वाचित घोषित किया जाएगा। इसके बावजूद नगर निगम अधिनियम को नजरअंदाज करते हुए इस तानाशाही सरकार के प्रभाव व दबाव में नगर आयुक्त ने भाजपा पार्षद के पक्ष में निर्णय दिया जो कि निंदनीय है।

अमरदेव यादव,पूर्व उपसभापति नगर निगम वाराणसी


  -कमल पटेल,नेता- पार्षद दल (सपा)

विपक्ष का होने के बावजूद हम सभी लोग बार-बार महापौर की बातों पर भरोसा कर ले रहे हैं लेकिन उनकी तरफ से भरोसे को तोड़ने का काम किया जा रहा है। हमें विश्वास था कि कोई भी निर्णय महापौर ईमानदारी के साथ लेंगी लेकिन हम फिर ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।लेकिन ऐसा नही हुआ। उपसभापति के चुनाव का निर्णय गलत और पक्षपात पूर्ण हुआ जिसकी हम निंदा करते हैं।

-कमल पटेल,नेता- पार्षद दल (सपा)
प्रशांत सिंह 'पिंवूâ',कार्यकारिणी सदस्य (सपा)

नगर निगम में उपसभापति के चुनाव में महापौर को वोट देने का अधिकार नहीं है इसके बावजूद महापौर ने जबरजस्ती उपसभापति पद के प्रत्याशी के पक्ष में अपना मत घोषित करते हुए उन्हें उपसभापति निर्वाचित किया जो निंदनीय है जो हुआ गलत हुआ ऐसा नहीं होना चाहिए था। ये सब शासन सत्ता की मनमानी है भाजपा के दबाव में ही नगर आयुक्त ने भी गलत निर्णय लिया।

प्रशांत सिंह 'पिंवूâ',कार्यकारिणी सदस्य (सपा)


 रमजान अली,कार्यकारिणी सदस्य (कांग्रेस)

यह लोकतंत्र की हत्या है नगर निगम में कायदे कानून का कोई मतलब नहीं रह गया है। किसी भी प्रस्ताव पर वोट देने का अधिकार महापौर को होता है ना कि निर्वाचन की प्रक्रिया में वोट देने का अधिकार महापौर को है। महापौर यह भी नहीं बता सकती कि उन्होंने नगर निगम अधिनियम की किस धारा या किस शासनादेश के तहत उपसभापति के चुनाव में अपना निर्णय मत दिया।

रमजान अली,कार्यकारिणी सदस्य (कांग्रेस)