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बुधवार 16-सितम्बर -18
कॉमेडी,एक्शन व इमोशन से भरपूर भोजपुरी फिल्म संघर्ष



एक्शन और फैमिली ड्रामा से भरपूर यह फिल्म बेटियों के महत्व के बारे में समाज के हर वर्ग को एक अच्छा मैसेज देने का काम करेगी। इस फिल्म के जरिये ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं’ के संदेश को आगे बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है। फिल्म संघर्ष के निर्माता रत््नााकर कुमार हैं। सह निर्माता हेमंत गुप्ता तथा कार्यकारी निर्माता मुन््नाा हैं। फिल्म का निर्देशन कर रहे हैं कुशल निर्देशक पराग पाटिल। लेखक राकेश त्रिपाठी हैं। गीतकार प्यारेलाल यादव कवि, आजाद सिंह, पवन पांडेय के लिखे गीतों को संगीत से सजाया है संगीतकार मधुकर आनंद व धनंजय मिश्रा ने। छायांकन आर आर प्रिंस, नृत्य रिक्की गुप्ता व महेश आचार्य, मारधाड़ दिलीप यादव, कला अंजनी तिवारी, मार्केटिंग दिलशाद शाह, संकलन गुर्जंट सिंह का है। भोजपुरी फिल्म संघर्ष के मुख्य कलाकार-खेसारी लाल यादव, काजल राघवानी, ऋतू सिंह, अवधेश मिश्रा, महेश आचार्य, संजय महानंद, निशा झा, रीना रानी, प्रेरणा सुषमा, सुबोध सेठ, देव सिंह, दीपक सिन्हा, सुमन झा, यादवेंद्र यादव आदि हैं।

भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार खेसारी लाल यादव और काजल राघवानी अभिनीत फिल्म 'सँघर्ष' मूवी पिछले माह अगस्त में रिलीज हुई। रिलीज के दिन से आज तक बॉक्स ऑफिस पर भोजपुरीया समाज सहित समाज के अन्य तबके और हिंदी फिल्मों के शौकीनो को भी आकर्षित कर वाह-वाही बटोर रही 'सँघर्ष' अश्लीलता, भोंडेपन से मुक्त बेहद परिवारिक और सामाजिक और मनोरंजक फिल्म है। 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का संदेश दे रही यह मूवी दर्शकों को बेहद पसन्द आ रही है। कॉमेडी, एक्शन, इमोशन का भरपूर तड़का होने के बावजूद फिल्म का पूरा फोकस इस बात पर है कि जो लोग बेटी पैदा होने को बोझ और बेटे को वंश बढ़ाने जैसी दकियानूसी विचारधारा पाले रहते हैं। आइए! ऐसे लोगों की आंखें खोलने वाली इस मूवी के बारे में जानते हैं।

भोजपुरी फिल्मों के बारे में उच्च मध्यमवर्गीय लोगों की यह धारणा होती है कि भोजपुरी फिल्में सामाजिक मुद्दों से इतर सिर्फ द्विअर्थी गानों और लटकों झटकों पर बनी होती है, कुछ को छोड़ दिया जाए तो अब अधिकतर निर्माता निर्देशक एक्टर साफ-सुथरी स्क्रिप्ट स्टोरी पर ही काम करते हैं।

पराग पाटिल के निर्देशन में बनी फिल्म 'सँघर्ष' की कहानी एक गावँ के ऐसे जमींदार लोहा यादव (अवधेश मिश्रा) से शुरू होती है जो अपने छोटे बेटे कन्हैया (खेसारी लाल यादव) को बेहद मानता है, वहीं अपने बड़े बेटे और बहू को शादी के बाद बच्चा पैदा न होने के कारण बात-बात पर ताना मारता रहता है। लोहा को कन्हैया से अपने खानदान से चिराग की उम्मीद है ।

फिल्म के शुरुआती एक घण्टे दर्शकों को कन्हैया (खेसारी लाल) के दोस्त बने सुदामा की कॉमेडी और कन्हैया का एक्शन दर्शकों के ठहाका लगाने और 'इयऽऽऽऽ रजा...' कहने पर मजबूर कर देता है, वहीं फ़िल्म में खेसारी से एकतरफा प्रेम कर रहीं राधा (ऋतु सिंह) पर फिल्माया गया गाना 'का गारन्टी बा तू धोवल बाड़ू दूध से' पर सिनेमा हाल में युवा दर्शक सीटियां बजाने लगते हैं।

लोहा यादव जब-जब कन्हैया के शादी के लिए तैय्यारी करता है, कन्हैया के कहने पर दोस्त सुदामा राधा के साथ मिलकर शादी तोड़वा देता है। इसके बाद चाय की दुकान पर बैठे कन्हैया को मनचलों की पिटाई करते देख रुक्मिणी (काजल राघवानी) से प्यार हो जाता है। इसी दौरान कन्हैया (खेसारी) का बाप लोहा सिंह शादी के लिए कन्हैया को एक फोटो देता है कि बेटा एहि से तोहार शादी होई फोटो देख ला... मगर रुक्मिणी के प्यार में खोया कन्हैया अपने दोस्त सुदामा राधा को रुक्मिणी के घर भेज कहवा देता है कि वह कन्हैया के बच्चे की माँ बनने वाली है और शादी टूट जाती है। जब कन्हैया लिफाफे से फोटो निकाल कर देखता है कि यह तो रुक्मिणी की फोटो है तो वह परेशान हो राधा से कहता है कि 'राधा तू जेसे बियाह तोड़ववलु ह हम ओहि से प्यार करीला हमके उ न मिली तऽऽऽ हम मर जाब...' कन्हैया से एकतरफा प्यार कर रही राधा सारी बात जाकर रुक्मिणी के बाप को बताती है उसके बाद कन्हैया की शादी रुक्मिणी से हो जाती है। यहीं से फिल्म की कहानी में गम्भीरता आती है।

कुछ दिनों के बाद रुक्मिणी गर्भवती होती है तो लोहा सिंह सहित परिवार के सभी सदस्य खुश हो जाते हैं। कुछ दिन बाद हॉस्पिटल में रुक्मिणी एक बच्चे को जन्म देती है। जब पैदा हुए बच्चे को नर्स लोहा यादव के हाथ मे थमाती है तो कपड़े में लिपटे बच्चे को देख लोहा सिंह खुश होते हुए कहता है 'एकर नाम अर्जुन रही अर्जुन यादव...' तभी नर्स कहती है कि यह लड़का नही लड़की है। उसके बाद लोहा यादव के चेहरे की रंगत बदल जाती है और बेटी पैदा होने से सन््ना लोहा के हाथ से बच्ची फर्श की तरफ गिरने वाला होती है तभी दरवाजे पर खड़ा कन्हैया घुटने के बल सरक कर पकड़ कातर निगाहों से कभी लोहा यादव तो कभी बच्ची को देखता।

यह दृश्य ऐसा था कि सिनेमा हाल में मौजूद दर्शकों की आंखे सजल हो गईं थीं। हॉस्पिटल से पत््नाी व बेटी के साथ घर पहुँचे कन्हैया को बाप लोहा यादव कहता है कि 'तू ई घर मे तब्ब रहबा जब ई घर के चिराग देबा...' तब कन्हैया लोहा सिंह को उदाहरण दे समझाता है कि बाबू जी इंदिरा जी भी केहू के बेटी रहलीं, मदर टेरेसा भी केहू क बेटी रहलीं। तब लोहा सिंह कहता है कि पूरी दुनियां में बेटा ही वंश चलावलन...तू या त बेटा देबा या त तोहरे लिए ई घर का दरवाजा बंद।'

यह दृश्य ऐसा था कि सिनेमा हाल में मौजूद दर्शकों की आंखे सजल हो गईं थीं। हॉस्पिटल से पत््नाी व बेटी के साथ घर पहुँचे कन्हैया को बाप लोहा यादव कहता है कि 'तू ई घर मे तब्ब रहबा जब ई घर के चिराग देबा...' तब कन्हैया लोहा सिंह को उदाहरण दे समझाता है कि बाबू जी इंदिरा जी भी केहू के बेटी रहलीं, मदर टेरेसा भी केहू क बेटी रहलीं। तब लोहा सिंह कहता है कि पूरी दुनियां में बेटा ही वंश चलावलन...तू या त बेटा देबा या त तोहरे लिए ई घर का दरवाजा बंद।'

इसके बाद कन्हैया पत््नाी रुक्मिणी व बेटी पिंकी को साथ लेकर घर छोड़ देता है । इस दृश्य पर सिनेमा हाल में दर्शक लोहा यादव (अवधेश मिश्रा) पर अपनी भड़ास निकालने लगते हैं। घर से निकल कन्हैया पत््नाी व बच्चे के साथ बस स्टैंड जाता है। वहीं सफाईकर्मी का काम कर रहे दोस्त डमरू कि निगाह कन्हैया पर पड़ती है और उसे अपने घर ले जाता है । यहीं रहकर कन्हैया मंडी में पीठ पर बोरा ढोने (पल्लेदारी) और हाथ गाड़ी चलाने लगता है। समय के साथ बेटी पिंकी बड़ी होने लगती है इस दौरान घर ले जाने के लिए कन्हैया के भाई और रुक्मिणी के पिता भी आते हैं। मगर अपने बूते अपनी बेटी को पालने-पढ़ाने की सोच बना चुके रुक्मिणी कन्हैया साफ मना कर देते हैं ।

एक दृश्य में पिंकी कान्वेंट स्कूल को देखकर कहती है पापा हम इसमें पढ़ सकते हैं? बेटी को उच्च शिक्षा देने की ठान चुका कन्हैया बेटी पिंकी को पत््नाी रुक्मिणी के साथ भेजकर, पैसे की व्यवस्था न देखकर शहर में हो रहे कुश्ती प्रतियोगिता में एक लाख के इनाम के चक्कर मे रेसलर से भिड़ जाता है। रेसलर से खूब पिटने के बाद कन्हैया का एक मुक्का रेसलर को धूल चटा देता है। बहुत देर से इमोशनल सीन में खोये दर्शक इस दृश्य को देखकर उत्साहित हो ललकारने लगते हैं।

फ़िल्म के अंतिम सीन में अब तक कन्हैया और रुक्मिणी अधेड़ हो चुके होते हैं । पिंकी यूनिवर्सिटी में पढ़ने जाती है वहीं एक आवारा लड़का प्रेम अपने दोस्तों से बाजी लगा पिंकी को इम्प्रेस कर अपने प्रेम जाल फ़ांस लेता है एक दिन हाथगाड़ी खींच रहे कन्हैया यह देख लेता है, जब बेटी पिंकी से यह पूछता है कि तुम कहाँ गयी थी तो वह बेहद रूखे शब्दों में यह कहती है कि वो बॉयफ्रेंड के साथ गयी थी और जब कन्हैया उसे समझाता है तो कहती है आप लोगों ने मेरे लिए किया ही क्या है, मेरी जिंदगी मेरे तरीके से जीने दिजीये।

यह सुन कन्हैया दुखी हो टूट जाता है और घर से निकल जाता है , यह सब सुन रहे डमरू को गुस्सा आ जाता है पिंकी से कहता है कि... सोना के पालने में पलल ई इंसान तोहरे खातिर अपने जिंनगी के मिट्टी कर देहलस सोचलस की तोरे वजह से समाज के जवाब देब तू ई कहत हउ आव तोके देखाई की तोरे वदे तोहार बाप का करला पिंकी का हाथ पकड़ मंडी ले जाता है जहां कन्हैया हाथगाड़ी पर सामान लाद कर खींच रहा होता है यह देखकर पिंकी भावुक हो जाती है और पिता कन्हैया से रोकर माफी मांगती है।

कालेज जा प्रेम को मना करती है कि आज से मेरा तुम्हारा सम्बन्ध खत्म तो प्रेम जबरदस्ती पर उतर आता है ,मौके पर कन्हैया मारपीट कर बेटी को छुड़ाता है । यहीं से पिंकी जोरों शोरो से सिविल सेवा की तैयारी कर कलक्टर बन जाती है। लोहा सिंह के गावँ में ही पिंकी का सम्मान समारोह आयोजित किया जाता है। वहीं दूसरी ओर कन्हैया की भाभी को भी बीस साल बाद बच्चा पैदा होने वाला होता है। जब पिंकी गावँ में आती है तो लोहा यादव को भी कुछ लोग कलक्टर को दिखाने ले जाते हैं, पिंकी मंच से कहती है कि मैं इसी गावँ की बेटी हूँ मेरे दादा दादी यही रहते हैं मैंने उन्हें देखा नही है। आज इस मौके पर वो रहते तो अच्छा लगता आयोजक दादा का नाम पूछते हैं तो वह कहती है लोहा यादव। यह सुनते ही लोहा पहले तो चौंकता है इसके बाद खुशी और आंसुओ के साथ मंच पर पहुंच पिंकी,कन्हैया,रुक्मिणी से माफी मांगता है मैंने बहुत गलत किया था। इस सीन को देख सिनेमा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज जाता है। इसी दौरान गावँ का एक व्यक्ति आकर कहता है कि चाचा अजय भइया के लईकी भयल हव यह सुनते ही अचानक लोहा यादव की मुख मुद्रा चेंज होती है फिर अचानक से लोहा यादव खुश होकर कहता है त का भयल ई त घर मे एक अउर कलेक्टर आ गईल। और फ़िल्म समाप्त हो जाती है। फिल्म के गीत डायलाग दृश्य शुरू से अन्त तक दर्शकों को बांधे रहती है फिल्म के एक्शन सीन साउथ के फिल्मों के तर्ज पर इफेक्ट दिए गए हैं ,वहीं गानो की बात की जाए तो साफ सुथरे अश्लीलता मुक्त तरीके से फिल्माए गए हैं गाने के बोल और म्यूजिक का भी बढिया तालमेल है। खेसारी के बोले गए अधिकतर डायलॉग स्त्री सम्मान को बढ़ावा देने वाले हैं, आंख पर पड़ल परदा हटावा... जमाने के साथ चल के देखावा... बेटी बचा ला बेटी पढ़ा ला पर दर्शक जोरदार ताली बजा रहे थे। कुल मिलाकर सँघर्ष सामाजिक मुद्दे पर बनी एक जोरदार मूवी है जिसमें खेसारी लाल यादव, अवधेश मिश्रा , काजल राघवानी सहित पूरे यूनिट के मेहनत साफ दिखती है ।

फिल्म समीक्षा: विनय मौर्या, विशेष सहयोग : रघुवर यादवर्ट