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बुधवार 30-मई-2018
वाराणसी के पाॅपुलर हाॅस्पिटल में मानवता हुई शर्मसार पैसे के भूखे डाॅक्टरों ने की निर्ममता की सारी हदें पार वाराणसी के पाॅपुलर हाॅस्पिटल में मानवता हुई शर्मसार पैसे के भूखे डाॅक्टरों ने की निर्ममता की सारी हदें पार वाराणसी के पाॅपुलर हाॅस्पिटल में मानवता हुई शर्मसार पैसे के भूखे डाॅक्टरों ने की निर्ममता की सारी हदें पार



‘मुझे मेरे लाल की मिट्टी दे दो’

वाराणसी के पाॅपुलर हाॅस्पिटल में मानवता हुई शर्मसार
पैसे के भूखे डाॅक्टरों ने की निर्ममता की सारी हदें पार

17 हजार रुपये के लिए 17 घण्टे तक...
आजाद की लाश को कलेजे से लगाने को तड़पती रही माँ !

वाराणसी। दुनिया में डॉक्टर को भगवान की संज्ञा दी गई है।कहा जाता है कि किसी इंसान के जीवन और मौत का निर्धारण ऊपर बैठा केवल भगवान ही कर सकता है,वही मौत के मुंह में जा रहे इंसान को जीवन दान दे सकता है और यही काम धरती पर डॉक्टर करते हैं,जो मृत्यु के मुंह से भी इंसान को खींच लाते हैं। इस अद्भुत चमत्कार के कारण ही इन डॉक्टरों को इस धरती पर भगवान की तरह पूजा जाता है पर वर्तमान समय में कुछ ऐसे लोभी और स्वार्थी डॉक्टर भी है जो पैसे के लिए किसी हद तक गिर सकते हैं।पैसे के लिए उन्हें अगर मानवता और निर्ममता की भी सारी हदें पार करनी पड़े तो भी वे उस स्तर तक गिर सकते हैं।ऐसे डॉक्टरों को इंसान का दुख दर्द नहीं बल्कि उन्हें केवल और केवल पैसा दिखाई देता है। संवेदना इनमें कब की मर चुकी होती है वो खुद भी नहीं जानते और संसार में जिस इंसान की संवेदना मर जाए उसे भगवान नहीं शैतान कहा जाता है। ऐसा ही शैतानी कृत्य २६ मई को वाराणसी के एक बड़े नाम वाले 'पॉपुलर हॉस्पिटल' में देखने को मिला। यहां मात्र १७ हजार रुपये के लिए एक ६ महीने के मासूम की लाश को १७ घंटे तक हॉस्पिटल प्रशासन ने उसके मां-बाप को नहीं दिया गया। एक मासूम की मौत पर मां-बाप और परिजन दहाड़े मारकर रोते रहे पर इन सवेंदनाशून्य और निर्मम डॉक्टरों को तनिक भी दया नहीं आई। उस गरीब मजदूर से बार-बार यह कहा जाता रहा कि जब तक पैसा नहीं लाओगे बच्चे की लाश नहीं मिलेगी।

सोनभद्र में ईट भट्ठा पर मजदूरी करने वाला रविंद्र राजभर अपने ६ महीने के बीमार मासूम बच्चे को लेकर २४ मई की भोर में वाराणसी के पॉपुलर हॉस्पिटल में आया। जहां बच्चे का इलाज शुरू हुआ और अगले ही दिन यानी २५ मई की शाम वह मासूम इस बेरहम दुनिया की वैâद से आ़जाद हो गया। अभी तक तो उसकी मां ने अपने लाल को भर ऩजर निहारा भी नही था, विडम्बना तो देखिए इस मासूम की मां ने बड़े ही अरमानों के साथ अपने कलेजे के टुकड़े का नाम भी 'आ़जाद' रखा था।

बहरहाल शायद गरीबी की मार झेल रही मां की किस्मत में चंद दिनों के लिए ही उसके लाडले का साथ था।
२५ मई की शाम को जब बच्चे की मृत्यु हो गई। तब तक इन डॉक्टरों ने इलाज के नाम पर उस गरीब मजदूर से १२ हजार रुपये वसूल लिया था। शाम को जब रविंद्र और उसकी पत््नाी को पता चला कि बच्चा अब इस दुनिया में नहीं रहा है तो वे रोते-बिलखते डॉक्टर के पास उसकी लाश लेने के लिए पहुंचे। तब पॉपुलर हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने उस बच्चे को उन्हें देना तो छोड़िए एक झलक देखने तक भी नहीं दिया। उनका कहना था कि पहले जाओ १७ हजार रुपए लेकर आओ फिर बच्चे की लाश तुमको देंगे। गरीबी की स़जा भुगत रहे उस बेकसूर बाप ने पत्थर हो चुके अपने कलेजे के टुकड़े की खातिर अपने सगे संबंधी और परिजनों को फोन कर उनसे पैसे की मांग की पर किसी के पास भी इतने पैसे नहीं थे। लिहाजा चाहकर भी उसके अपने उसके आंसुओ को कम ना कर सके। लाचार होकर वह वही हॉस्पिटल के सामने रोता बिलखता पड़ा रहा और बार-बार डॉक्टरों से जा कर यह गुहार लगाता कि 'मुझे मेरे लाल की मिट्टी दे दो' पर बेरहम और पैसे के लोभी डॉक्टरों को उस पर तनिक भी दया और मोह नहीं आई। २६ मई के दोपहर में बच्चे के मौत के कुल १७ घंटे बाद हमारे रणभेरी प्रतिनिधी ने वहां पहुँच कर उसके परिजनों से १०० नंबर पर पुलिस को फोन करने को कहा। जब रविंद्र और उसके रिश्तेदारों ने १०० नंबर पर फोन किया तब पुलिस आई। उसके बाद भी काफी जद्दोजहद के बाद उसके बच्चे की लाश उसे मिल पाई। और फिर टूटे हुए मन और बिखरे हुए अरमानों के साथ अपने कलेजे के टुकड़े से लिपट कर वह अभागे माँ-बाप इस शहर से बेहद दर्द भरी यादों को लेकर लौट गये।

पॉपुलर हॉस्पिटल में यह पहला ऐसा मामला नहीं है जिसमें डॉक्टरों ने ऐसा कुकृत्य किया हो। इससे पहले भी कई बार पॉपुलर हॉस्पिटल में मानवता शर्मसार हुई है और पैसे के लिए कई गरीब मरीजों को मार दिया गया है। दरअसल प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कुकुरमुत्ते की तरह पनपने वाले कई ऐसे प्राइवेट हॉस्पिटल है जो मरीज को रुपए छापने वाली मशीन समझते हैं।अगर उनके यहां कोई दुख दर्द से तड़पता हुआ चला जाता है तो उन्हें उस इंसान का दुख दर्द नहीं बल्कि पैसा ही पैसा दिखाई देने लगता है और इस पैसे की हवस में इंसानियत और मानवता की सीमा वे कब लांघ जाते हैं उन्हें पता ही नहीं चलता। शहर में सैकड़ो ऐसे हॉस्पिटल हैं जहां गरीब मजदूरों का शोषण होता है खून पसीने से संचित उनकी गाढ़ी कमाई पानी की तरह बह जाती है क्योंकि उस समय इंसान जीवन और मौत के बीच में जूझ रहा होता है उसे किसी तरह उस व्यक्ति का जीवन दिखाई देता है उसके लिए चाहे जितना भी पैसा खर्च करना पड़े वह खर्च करता है। पर इन हॉस्पिटलों में एक छोटी जांच से लेकर बेड चार्ज, हॉस्पिटल चार्ज और दवाइयों तक मरीजों को लूटा जाता है या यूं कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उनके साथ सरेआम डकैती की जाती है। सबको मालूम है कि दवाओं और जांचों में पहले से इन डॉक्टरों और हॉस्पिटल का कमीशन फिक्स होता है। ऐसे कई मामले लगातार वाराणसी में आ रहे हैं जिसमें प्राइवेट हॉस्पिटलों में लापरवाही की वजह से लोग मर जाते हैं पर इन हॉस्पिटलों के डॉक्टर मरने के बाद भी उनसे पैसे वसूलते हैं। विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र होने के बावजूद भी मात्र औपचारिकता के इन हॉस्पिटलों पर कोई उपयुक्त कार्यवाही नहीं हो सकी है और ना ही इनका कोई फीस संबंधी या जांच संबंधी नीति निर्धारण ही हो पाया है। गरीब मर रहे हैं और उनकी मौत की आग पर ये बेरहम डॉक्टर दौलत की खिचड़ी पका रहे है। शासन और प्रशासन मौन है। इसमें इन डॉक्टरों की ही नहीं बल्कि इन्हें यह कृत्य करने देने की छूट देने वाले प्रशासन और शासन भी उतनी ही दोषी है। पता नहीं कब तक ऐसे ही गरीबों की जिंदगी तबाह और खुशियां उजड़ती रहेगी और धरती पर भगवान के भेष में छुपे इन लोभी शैतानों की दुकान चलती रहेगी।

अमरेन्दर पाण्डेय की रिपोर्ट