बुधवार ,19-जून -19

मुर्दों के बाजार में जिंदों का टोटा



मुर्दों के बाजार में जिंदों का टोटा मुर्दों के बाजार में जिंदों का टोटा मुर्दों के बाजार में जिंदों का टोटा

  • मणिकर्णिका घाट पर लग रहा मुर्दों का जमघट, रात को नहीं मिल रहे एक भी मजदूर
  • शव के साथ आने वाले लोगों को खुद ढोनी पड़ रही है चिता की लकड़ी
  • शव जलाने के लिए करना पड़ रहा घंटों इंतजार, भीड़ से घाट पर बैठने की तक की नहीं बच रही जगह

200
दो सौ से ज्यादा शव आ रहे है रोज

100
दो सौ से ज्यादा शव आते है केवल रात में

14
से 15 कर्मचारी है। शव जलाने के लिए

25
शव को एक बार में जलाने की है व्यवस्था

350
प्रति मन लकड़ी की कीमत

1995
में घाट पर हुई थी सबसे ज्यादा शवों की भीड़
05
कम से कम लकड़ी लगती है एक शव को जलाने में

35
कुंतल से ज्यादा की है रोज की लकड़ी की खपत

300
रुपये मिलते है कर्मचारी को एक शव जलाने के लिए

500
आग लेने का शुल्क

2
से 3 घंटा लगता है शव जलाने में

गौरतलब


वाराणसी। स्मार्ट सिटी के महाश्मशान पर आने वाले लोग इस समय काफी परेशान और हैरान हो रहे हैं। गर्मी के चलते मणिकर्णिका घाट पर रोजाना शवों का जमघट लग रहा है, बावजूद इसके सुविधाएं धड़ाम हो चुकी हैं। अव्यवस्था का आलम यह है कि मुर्दों के बाजार में तब्दील हो चुके इस घाट पर मजदूरों की भारी कमी हो चुकी है। जिसकी वजह से शव के साथ आए अच्छे खासे लोगों को भी चिता की लकड़ी ढोने से लेकर कई अन्य कार्य खुद करने पड़ रहे हैं। घाट से पैसे कमा रही डोम राज समिति और जिला प्रशासन की ऐसी स्थिति में कोई पूर्व निर्धारित योजना या सुविधा न होने की वजह से शवों को जलाने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि भारी भीड़ के चलते घाट पर बैठने तक की जगह नहीं बच रही।


रात को नहीं मिलते एक भी मजदूर


भीषण गर्मी की वजह से सुदूर क्षेत्रों के लोग ज्यादातर रात के समय ही शव को लेकर घाट पर आ रहे हैं। जिससे दिन के अपेक्षा रात को भीड़ दोगुनी से भी ज्यादा हो जा रही है। लकड़ी कारोबारी दिनेश पाण्डेय के अनुसार दिन में 50-60 तो रात को 100-150 शव घाट पर आ रहे हैं पर रात को दुर्व्यवस्था और अधिक बढ़ जा रही है। दिनभर गर्मी और धूूप में काम कर रहे मजदूर रात को काम छोड़कर चले जा रहे हैं। किसी भी लकड़ी के दुकान पर एक भी मजदूर नहीं मिल रहे। इससे मजबूरी में शव के साथ आए अच्छे खासे लोगों को भी चिता की लकड़ी खुद ढोनी पड़ रही है।

अंतिम संस्कार के लिए लंबा इंतजार


काशी को मुक्तिधाम कहा जाता है। पुराणों मे वर्णित है कि यहां के महाश्मशान पर खुद भगवान शिव मुर्दों के कान में तारक मंत्र फूंकते हैं, जिससे उनको परलोक की प्राप्ती होती है। सच कहा जाए तो यह महाश्मशान ही काशी की मूल पहचान है बावजूद शासन और प्रशासन का इस पर जरा सा भी ध्यान नहीं है। सबको मालूम है कि गर्मी और जाड़े में शवों की संख्या बढ़ती है बावजूद इस मद्देनजर कोई भी व्यवस्था न किया जाना घोर लापरवाही की ओर इंगित करता है। इस समय रोजाना 250 से ज्यादा शव घाट पर आ रहे हैं। शव को जलाने के लिए 14 लोहे के शव स्टैंड बनाए गए हैं इसके अलावा 10 शवों को नीचे जमीन पर भी जलाया जाता है कुल मिलाकर एक बार में 15 से 20 शव ही जल पाते हैं। एक शव को जलने में 3 से 4 घंटे लगते हैं। शवों की बढ़ी संख्या और स्थान की कमी से घाट पर शवों का बाजार सा लग जा रहा है। अंतिम संस्कार के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।

सीवर-सड़क जाम, सफाई व्यवस्था धड़ाम


मणिकर्णिका घाट पर लोगों की बढ़ी भीड़ की वजह से गलियों में पैर रखने तक की जगह नहीं बच रही है। वहीं खड़े वाहनों से पूरा रास्ता जाम हो जा रहा है। घाट पर हमेशा 300 से ज्यादा बाइक खड़ी रहती हैं जिनसे रास्ते से आने-जाने वाले लोगों को काफी दिक्कत हो रही है। इन सबसे बीच घाट पर महीनों से सरेआम सीवर बह रहा है जिससे होकर लोग आने- जाने को मजबूर हैं। कहने को तो घाट की सुबह शाम घाट की साफ-सफाई नमामि गंगे द्वारा कराया जाता है पर यह सफाई कहीं भी दिखाई नहीं देती। सीढ़ियों पर लकड़ी का और श्मशान पर जहां-तहां कूड़े का ढेर लगा हुआ है।


जान मानस की राय


-हमलोग काफी दूर से आए हैं। सब लोग काफी थक चुके हैं। घाट पर आने के बाद पता चला कि यहां लकड़ी ढोने वाला कोई मजदूर ही नहीं है। लकड़ी वाले से ज्यादा पैसे देकर मजदूर मंगाने की बात की तब भी मजदूर नहीं मिले, मजबूरी में हमसबको ही चिता की लकड़ी ढोनी पड़ी।
राममूरत सिंह, बक्सर



-कहने को तो यह प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है पर यहां की दुर्व्यवस्था देखकर तो लगता है यहां कभी कोई आता ही नहीं। घाट पर सीवर और गंदगी का सरेआम अंबार है। लकड़ीवाले के साथ अन्य दुकानदारों की काफी मनमानी है। वे जैसा चाह रहे हैं वैसा ही हो रहा है।
श्रवण राम, भदोही

-शव को लेकर हमलोग 7 बजे शाम को घाट पहुंच गए थे। यहां पर इतनी लंबी लाइन लगी कि 11 बजे शव चिता पर पहुंचा और जलने में 4 बज गए। एक शव जलाने में 10 घंटे लग गए भाई। न यहां कोई व्यवस्था है और न ही कोई नियम।
मिट्ठू शर्मा, रोहतास



-घाट पर लोगों की इतनी ज्यादा भीड़ है पर व्यवस्था एकदम शून्य है। पीने के पानी, शौचालय आदि की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और न हीं शव के साथ आने वाले परिजनों को ही बैठने की जगह है। इतनी गर्मी में यहां आने के बाद दुर्व्यवस्था के चलते लग रहा है कि जान ही निकल जाएगी।
मनोज पाण्डेय, कैमूर



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