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शनिवार , 21 अक्टूबर 17





          वाराणसी। किसी भी शिक्षण संस्थान की शिक्षा व्यवस्था में सुधार वहां के मुखिया यानी की प्राचार्य की नैतिक जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि उनका धर्म होता है और जब किसी शिक्षण संस्थान का मुखिया ही अपने कर्तव्य-अपने धर्म को भूलकर के भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का साथ दे तो समझना चाहिए कि उस शिक्षण संस्थान का पतन नजदीक है ।

          ताजा मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के हृदय स्थल मैदागिन स्थित श्री हरिश्चंद्र स्नाातकोत्तर महाविद्यालय का है जहां के प्राचार्य ने अपने कलम से भ्रष्टाचार का ऐसा खेल खेला है जिसे सुनकर कोई भी शर्मसार हो सकता है। हरिश्चंद्र महाविद्यालय के वर्तमान छात्र संघ के महामंत्री शुभम कुमार सेठ का आरोप है की प्राचार्य सोहन लाल यादव ने इस सत्र में स्वतंत्रता सेनानियों, उनके आश्रितों ,एनसीसी और विकलांगों के सीट पर फर्जी तरीके से २०० से भी ज्यादा छात्रों का मोटी रकम के एवज में एडमिशन कराया है। शुभम ने बताया कि प्राचार्य के ही संरक्षण में महाविद्यालय के ही पूर्व छात्रों का एक रैकेट है जो फर्जी एडमिशन का खेल खेलते हैं। जो प्रवेशार्थी प्रवेश परीक्षा में कम अंक पाते हैं और वे महाविद्यालय में प्रवेश के लिए अयोग्य होते हैं ऐसे विद्यार्थियों से यह रैकेट मिलता है और महाविद्यालय में प्रवेश कराने के लिए उनसे १० से २० हजार रूपये लिए जाते है। उनका फर्जी स्वतंत्रता सेनानी, उनके आश्रितों की डायरी और एनसीसी,एनएसएस या विकलांग का प्रमाण पत्र बनवा दिया जाता है । जब वह प्रमाण पत्र प्रमाणित करने हेतु प्राचार्य के पास जाता है तो चूंकि प्राचार्य पहले से उस रैकेट से मिले होते हैं इस वजह से वह बिना जांच पड़तालके हीं प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर कर देते हैं और छात्र का एडमिशन फर्जी तरीके से हो जाता है ।शुभम ने बताया कि इस वर्ष एलएलबी सहित कई विषयों में जिन छात्रों के फर्जी रूप से एडमिशन हुए हैं उनमें से १० के नाम मैं आपको अभी गिना सकता हूं जिनके पिता स्वतंत्रता सेनानी नहीं रहे हैं या वह कहीं से भी विकलांग नहीं दिख रहे हैं। केवल पैसे के बल पर ऐसे प्रवेशार्थियों का महाविद्यालय में एडमिशन कर दिया जाता है शुभम बताते हैं कि इसके वजह से जो वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र होते हैं या उनके आश्रित या एनसीसी या फिर विकलांग होते हैं उनको जगह नहीं मिल पाती उनका एडमिशन नहीं हो पाता और वे निराश होकर महाविद्यालय से लौट जाते हैं।

          सबसे शर्मनाक तो बात यह है कि यह अपराध महाविद्यालय में आज से नहीं बल्कि ८-१० सालों से खेला जा रहा है और इस पर सभी की मौन सहमति है। शुभम का आरोप है कि 'इस साल जो फर्जी तरीके से महाविद्यालय में एडमिशन हुए उसकी जांच के लिए वह अपने साथियों के साथ १३ सितंबर को प्राचार्य सोहन लाल यादव को प्रार्थना पत्र देने गए तो प्राचार्य ने प्रार्थना पत्र को लेने से इंकार किया और कहा कि मैं यह जानता हूं की एडमिशन फर्जी हुए हैं पर जो महाविद्यालय की परंपरा चली आ रही है वह चलती रहेगी उसमें तुम लोग कुछ नहीं कर सकते।' जब शुभम ने उन पर आवेदन लेने के लिए जोर दिया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारा कार्यकाल खत्म हो चुका है और उन्होंने कोतवाली थाना प्रभारी को यह फोन करके बुलाया कि छात्र मेरे साथ गुंडागर्दी कर रहे हैं। एसओ के आने के बाद समझौते के रूप में प्राचार्य ने आवेदन रिसीव कर लिया लेकिन उसके बाद भी २०-२२ दिनों तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। तब छात्रों का एक दल ५ अक्टूबर को सिटी मजिस्ट्रेट डॉक्टर विश्राम से मिला और उन्हें अर्जी दी। सिटी मजिस्ट्रेट ने छात्रों का प्रार्थना पत्र तो ले लिया लेकिन उन्होंने कहा कि जब तक मेरे से ऊपर का अधिकारी आदेश नहीं करता तब तक मैं कुछ नहीं कर सकता। फिर भी छात्रों ने हार नहीं मानी और १० अक्टूबर को वाराणसी के जिलाधिकारी योगेश्वर राम मिश्र से मिलकर उन्हें पूरी बात बताई। जिलाधिकारी ने तुरंत नगर मजिस्ट्रेट को जांच का आदेश दिया। नगर मजिस्ट्रेट डॉक्टर विश्राम ने प्राचार्य को संबंधित कागजातों को शीघ्र दिखाने का नोटिस भेजा। अब देखना यह है कि नगर मजिस्ट्रेट के फरमान पर महाविद्यालय के प्राचार्य का क्या रूख होता है। हालांकि छात्रों ने जब प्राचार्य से संबंधित दस्तावेज मजिस्ट्रेट को सौंपने की बात कही तो प्राचार्य ने कहा कि तुम लोगों को जो करना है करो जहां तक जाना हो जाओ कुछ होने वाला नहीं।

          निष्कर्षतः यह देखा जाए तो एक छात्र होने के नाते शुभम कुमार सेठ की मांग जायज है और अगर प्राचार्य सत्य हैं तो उन्हें संबंधित कागजात शीघ्र ही मजिस्ट्रेट को सौंप देना चाहिए। उनके सम्बंधित कागजात न दिखाने और टालमटोल करने से यह साबित होता है कि निश्चित ही दाल में कुछ काला है। छात्रों के वास्तविक मुद्दे पहले भी इस विद्यालय में दबाए गए हैं जैसे कि अभी कुछ ही दिन पहले शुभम कुमार सेठ के ही द्वारा विद्यालय में पुलिस बूथ बनाने की मांग की गई थी क्योंकि विद्यालय में आए दिन मारपीट होती है छात्राओं के साथ छेड़खानी होती है लेकिन एक साजिश के तहत छात्रों के उस मांग को भी दबा दिया गया। कोतवाली एसओ ने आश्वासन दिया था कि विद्यालय में पुलिसकर्मियों को लगाया जाएगा। लेकिन कभी भी कोई भी पुलिसकर्मी विद्यालय परिसर में नहीं दिखता। ऐसे में प्राचार्य के साथ-साथ प्रशासन का रवैया भी संदेह के घेरे में आता है।