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सोमवार , 22 सिंतबर 16
क्या वीरा जैसा वतनपरस्त बेटा फिर पैदा होगा
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          वह वीरा था। अपनी माँ का वीरा, पंजाब का वीरा, इस देश का वीरा। उसकी रघो में वतनपरस्ती का लहू दौड़ता था, उसका रोम-रोम ब्रिटिश हुवूâमत के खिलाफ जंग को आतुर था। उसके बाजुओं में तानाशाही सरकार को उखाड़ पेंâकने की क्षमता थी। उसके पैरों में साम्राज्यवादी व्यवस्था को कुचलने की ताकत थी। उसके दिल में गरीबों, मजदूरों, किसानों व बेसहाराओं के प्रति बेइंतहा मुहब्बत थी। उसकी आत्मा जाति और धर्म के झगड़े से नफरत करती थी। उसकी आँखों में आजाद भारत का सपना था। वही वीरा जिसे महज २३ वर्ष की उम्र में फाँसी के तख्त पर लटका दिया गया। उसकी माँ उसके सिर को अपनी गोद में रखकर सहलाने के लिए तरसती रह गयी, उसकी बहन उसकी कलाई में राखी बाँधने का इन्तजार करती रह गयी और पिता बुढ़ापे के सहारे के लिए जवान बेटे का कांधा ढ़ूंढ़ता रह गया। मगर वह लौट कर नहीं आया, वह चला गया। इस देश को छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए। उसकी बुलन्द आवाज सदा के लिए खामोश हो गयी, ना जाने क्यूँ वह रूठ गया हमसे। उसके जाने के बाद कुछ बचा था तो लाहौर सेन्ट्रल जेल की बैरकों में खामोश सन्नाटा, आजादी के दीवाने क्रान्तिकारियों के चेहरों पर उदासी और माँ भारती की आँखों में आँसू। इसके सिवा कुछ भी नहीं।

          सच! लाचार, बेबस और अबला माँ भारती का एक वही तो भगत था, जिस पर उस माँ को नाज था, भरोसा था कि एक दिन गुलामी की बेरहम जंजीरों को तोड़कर उसे साम्राज्यवादी सलाखों की वैâद से आजाद कराने उसका बेटा आयेगा। इसी विश्वास के साथ ही तो उस माँ ने भगत को दुनियावी रणभूमि में युद्ध के लिए उतारा था। मगर हाय रे ! यह क्या हुआ ? युगों-युगों से उस माँ को नोंचने वाले दरिंदों ने उसके लाल को भी नहीं बख्शा। अभिमन्यु की भाँति ही वीरा भी युद्ध की रणभूमि में षड़यन्त्र का शिकार हो गया और साम्राज्यवादी चक्रव्यूह को न तोड़ सका।

          अब क्या होगा ? आखिर कौन तोड़ेगा गुलामी की बेरहम जंजीरों को, कौन ध्वस्त करेगा साम्राज्यवादी सलाखों को, कब मिलेगा समानता का अधिकार गरीबों और किसानों को, कब होगा यह देश पूर्णतया आजाद ? क्या वीरा जैसा वतनपरस्त बेटा फिर पैदा होगा ? रूकिये ! यह किसी नाटक की पटकथा या हिन्दी फिल्म का संवाद नहीं है। यह एक ज्वलंत प्रश्न है। प्रत्येक भारतीय से, जिसका जवाब हर उस सख्श को देना होगा जो इस देश में खुद को आजाद समझता है।

          यह प्रश्न हर उस माँ से है, जो एक बेटे को जन्म देने की तमन्ना रखती हैं। यह प्रश्न हर उस पिता से है, जो अपने बेटे को डॉक्टर, इंजीनियर या आफिसर बनाने का ख्वाब देखता है और हर उस नौजवान को भी जवाब देना होगा, जो इस जहाँ में औरों से जुदा कुछ कर दिखाने की चाहत रखता है। आखिर कौन करेगा वीरा के अधूरे सपनों को पूरा ? क्यों कोई माँ अपनी कोंख से वीरा जैसे देशभक्त बालक को जन्म देने की तमन्ना नहीं रखती ? क्यों कोई पिता अपने बेटे को क्रान्तिकारी बनाना नहींr चाहता ? क्यों आज नौजवान देश के खातिर अपने प्राणों की कुर्बानी देने की बात नहीं करते ? आखिर क्यों मौन हैं सब ? अरे ! कहीं ऐसा तो नहीं कि हर किसी को यह भ्रम हो गया है कि हम आजाद हो गये । नहीं-नहीं बिलकुल नहीं । हम तो आज भी गुलाम हैं। सच! यह आजादी तो झूठी है। चन्द लोगों की आजादी को हम वैâसे पूर्ण आजादी मान लें। जाओ जाकर भारत माँ से पूछो, ‘क्या वह आजाद है’ कब मिली थी उसे आजादी ! और यदि गुलाम माँ भारती से कोई जवाब न मिले तो चले जाना उस गरीबों की बस्ती में, किसानों के गाँव में, टूटी हुई झोपड़ी में और जंगलों के गुफाओं में, फिर समझ में आयेगा कि हम आजाद हैं या गुलाम।

          अतीत के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो सभी ने माँ भारती का दमन किया है। सदियों से इस देश पर साम्राज्यवादी ताकतों का शासन रहा है। यहाँ सच बोलने वालों को फाँसी के सिवाय कुछ नहीं मिलता। इस देश को कभी यूनानियों ने लूटा, कभी मुगलों ने लूटा, कभी ब्रिटिश हुक्मरानों ने तो आज उन्हीं के वंशजों द्वारा इस देश पर शासन किया जा रहा है। फर्वâ इतना है कि अब यह बताया जाता है कि हम आजाद हैं। कुछ देर के लिए यह मान भी लिया जाय कि हम आजाद हैं, तो आज जो लोग आजादी के साथ रंगों की होली खेल रहे हैं, वह क्यों भूल गये कि जिनकी बदौलत हम आजादी की होली खेल रहे हैं, उन्होंने इस देश के लिए खून की होली खेली थी। भारत की आजादी के क्रान्तिकारी आन्दोलन के रक्तरंजित पन्नों को पलटकर हम देखें तो रूह काँप उठती है। निश्चित रूप से २३ मार्च १९३१ की शाम लाहौर सेन्ट्रल जेल की उन पथरीली दीवारों ने भी रोया होगा जिन्होंने माँ भारती के लाडले भगत सिंह की देशभक्ति को अपनी आँखों से देखा होगा। अफसोस कि जिस महानतम् क्रान्तिकारी की कुर्बानी पर पत्थरों को रोना आया होगा, उसके अरमान आज भी अधूरे हैं। उसके सपनों का भारत आज भी कहीं गुम है। फाँसी पर चढ़ने के पूर्व उसने जो अपनी अन्तिम इच्छा व्यक्त की थी, वह आज भी अधूरी है।

         भगत सिंह ने फाँसी के पूर्व ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ का नारा लगाया था। वह इस देश में साम्राज्यवादी व्यवस्था का खात्मा चाहते थे। उन्होंने उस भारत की कल्पना की थी, जहाँ सभी एक साथ हों, समानता का भाव हो, ऊँच-नीच की भावना न हो, अमीरी और गरीबी का फर्वâ न हो। भगत सिंह ने हर एक आम आदमी के आजादी का आन्दोलन चलाया था। वह आजादी तो अभी अधूरी है, उस आन्दोलन को पुन: चलाने की जरूरत है। इस देश को फिर एक वीरा चाहिये, जिसने भगत सिंह के रूप में साम्राज्यवादियों के खिलाफ बिगुल बजाया था। वर्तमान भारत की स्थिति पूर्व से भी ज्यादा भयावह हो चुकी है। यदि वक्त रहते किसी माँ के कोंख से एक और वीरा ने जन्म नहीं लिया तो देश में बर्बादी और तबाही का वह मंजर सामने आयेगी, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।