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Friday, April 01, 2016
अमहामूर्ख मेले में सांड़ की हुरपेट...

महामूर्ख मेले का इतिहास...



     शनिवार गोष्ठी के संस्थापकों में हिन्दी हास्य साहित्य के वन्दनीय हस्ताक्षरों में बेढ़ब बनारसी, भैयाजी बनारसी, माधव प्रसाद मिश्र, श्री शंकर शुक्ल के साथ ही वरेण्य साहित्यकारों कमलाप्रसाद अवस्थी अशोक, गिरजाशंकर पाण्डेय, राहगीर तथा अन्य अनेक लोगों का नामोल्लेख किया जा सकता है। प्रारम्भिक दिनों में मधुर जलपान प्रतिष्ठान के संस्थापक स्व. केदारनाथ गुप्त के आवासों पर अनेक आयोजन होते रहे हैं।

     इसी क्रम में स्व. माधव प्रसाद मिश्र, भैयाजी बनारसी तथा पं. धर्मशील चतुर्वेदी ने निर्णय लिया कि गोष्ठी की ओर से पहली अप्रैल के नाम से एक वार्षिक प्रकाशन किया जाय। शुरू हुआ और घाट पर खड़े बजड़े पर प्रकाशन के लोकार्पण के साथ रंगारंग आयोजन भी होने लगा। बजड़े के आसपास घाट पर बैठे रसिकों की भीड़ बढ़ती रही। बाद में चकाचक बनारसी और सांड़ बनारसी भी जुट गये। फिर तय हुआ कि आयोजन चौक में भद्दोमल की छत पर किया जाय। उन दिनों छत पर सभायें तथा धार्मिक आयोजन हुआ करते थे।

     भद्दोमल की छत ने महामूर्ख सम्मेलन (तब यही नाम था) को अपने ही जैसी ऊँचाई दी। साल-दर-साल हाहाकारी भीड़ का वजन छत न उठा पाई और एक साल आयोजन से पूर्व तत्काल यह पता चला कि छत गोलाकार धंस गई। अचानक कोई विकल्प न मिला तो चौक थाने के परिसर में सम्भवत: दो वर्ष तक आयोजन करना पड़ा। इस विवशता की घड़ी में भाई गोविन्द के. दास ने उदारता दिखाई और नागरी नाटक मण्डली के प्रेक्षागृह का सम्पूर्ण व्यय वहन करने के साथ ही देश सभी ख्यातिलब्ध हास्यकारों की भीड़ जुटा दी। दो वार्षिक आयोजनों का बोझ शायद उन्हें भारी पड़ा।

     श्री गोविन्द के. दास की विवशता को भांपकर पं. धर्मशील चतुर्वेदी ने ताल ठोंककर कहा अब फिर गंगा मैया की शरण में चलेंगे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद घाट पूर्व प्रधान मंत्री स्व. राजीव गांधी की कृपा से बन कर तैयार हो गया था। लोगों ने आशंकायें जतायीं लोग नहीं आयेंगे, भद्द होगी, किरकिरी हो जायेगी। मगर डेढ़सी पुल की मण्डली सहायता में आ खड़ी हुई। पं. रगुल जी, बालाशंकर तिवारी बाले गुरू, महन्थ श्री नारायण शर्मा आदि। पहले ही आयोजन के साथ महामूर्ख सम्मेलन की जगह महामूर्ख मेला नामकरण हो गया।

     अपने कन्धों पर चौकियाँ, दरी, चांदनी घाट तक पहुँचाना, समेटना साधारण काम नहीं था। मगर धर्मशील चतुर्वेदी, चकाचक बनारसी की जिद के आगे सबको खटना पड़ा। केदार यादव, बड़ारू सरदार, भोलेनाथ जैसे जाने कितने दशाश्वमेधवासियों ने कन्धा लगाया। काशी के सरल, मस्तमौला, हास्यप्रेमी नागरिकों ने अपनी उन्मुक्त हंसी और ठहाकों से हममें संजीवनी भर दी। काशी विश्वनाथ और मां गंगा की कृपा ही थी कि आज, अड़तालिसवाँ आयोजन महामूर्ख मेला २०१६ आप सबके सामने है। इस वर्ष का विषय है ‘राष्ट्रवाद'।

     सिंह मेडिकल एण्ड रिसर्च सेन्टर के डॉ. अशोक कुमार सिंह, हेरिटेज के स्वामी डॉ. सिद्धार्थ राय, लक्ष्मी मेडिकल्स एण्ड हेल्थ केयर के डॉ. अशोक कुमार राय, भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नैशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा का भी सहकार महामूर्ख मेला को आसमान की बुलंदियों तक पहुंचाने में अमृत तुल्य सिद्ध हुआ।

     महामूर्ख मेला इस देश के साहित्यिक आयोजनों में आज सर्वोच्च शिखर पर है। आसपास के राज्यों तथा कुछ जनपदों में भी मूर्ख दिवस या होली के पर्व के आसपास हास्य आयोजन होते हैं। लेकिन जितने उन्मुक्त वातावरण में नगर के बीस से पच्चीस हजार दर्शक और श्रोता मंच के सामने बैठकर तथा एक ओर अस्सी और दूसरी ओर मणिकर्णिकाघाट तक घरों या घाटों में बैठकर भीड़भाड़ से दूर निछद्दम में आनन्द लेने वालों की संख्या भी कुछ कम नहीं।

महामूर्ख मेला क्यों?

     महामूर्ख मेला क्यों?शनिवार गोष्ठी वर्ष में अनेक आयोजन करती है। आनन्द के लिए। महामूर्ख मेला उनमें से एक है। चार-पाँच घण्टे हजारों व्यक्ति एक साथ बैठकर हँसते, खिलखिलाते, अट्टहास करते हैं। यह भी समाधि है क्योंकि इस अवधि में चिन्ता, रोग, क्लेष, दु:ख, कर्ज, तनाव, अभाव, राग-द्वेष सबसे मुक्त रहते हैं। इनसे मुक्त जीव ही तो शिव से साक्षात्कार करता है। बन्धनों से मुक्ति ही तो मोक्ष की अवस्था है।

     इस आयोजन के निवेदकों की भारी भरकम सूची निमंत्रण पत्र के साथ छपती है। सभी नगर के सम्भ्रान्त, सम्मानित, धनाड्य और कमाऊ हैं। कोई चन्दोपजीवी नहीं है। इसलिये गोष्ठी के किसी भी आयोजन का लक्ष्य जीवनयापन के लिये चन्दा बटोरना नहीं है। कोई इनमें से बेकाज, बेकाम भी नहीं है। अपने यश या धन का लोभ भी किसी को नहीं है। यह आयोजन आनन्द के लिये होता है महज आनन्द के लिये। हमारे अपने और नगर के मस्तमौला और फक्कड़ मिजाज हजारों काशीवासियों के लिए जो चना, चबैना, गंगजल और काशी विश्वनाथ की भक्ति के सिवा सब कुछ ठेंगे पर रखते हैं। यह सीढ़ियों का शहर है। आनन्द की एक सीढ़ी हम भी रचते हैं। एक पायदान और शिव के सानिध्य के लिये।

     धन की गति दान है। धन, सम्पत्ति, सम्पदा नाशवान है। किसी के दान से अनेकों को सुख और आनन्द ही नहीं जीवन भी मिले इससे अधिक उपयोगी भला धन की कोई गति हो सकती है? शनिवार गोष्ठी का हर आयोजन बहुजन सुखाय होता है इसी में सबका हित भी निहित है। आनन्द की प्राप्ति के इस महा अनुष्ठान में बिना किसी भेदभाव के काशी के हर नागरिक की सहभागिता रही है और जब तक आनन्द है तब तक यह आयोजन होता रहे इस विश्वास के साथ जीना चाहिए।

     अप्रैल ़पूâल दिवस अर्थात् ‘मूर्ख दिवस’ को १ अप्रैल के दिन विश्वभर में मौज-मस्ती और हंसी-मजाक के साथ एक-दूसरे को मूर्ख बनाते हुए मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने मित्रों, पड़ोसियों और यहाँ तक कि घर के सदस्यों से भी बड़े ही विचित्र प्रकार के हंसी-मजाक, मूर्खतापूर्ण कार्य और धोखे में डालने वाले उपहार देकर आनंद लेते हैं।’’